इसरो की रिपोर्ट से हुआ चौंकाने वाला खुलासा, उत्तराखंड के इस जिले में होता है सबसे ज्यादा भूस्खलन
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अनुष्का ढौंडियाल
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Secret Himalayan Treks Near Kedarnath You’ve Never Heard Of
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Image: Most landslides occur in Rudraprayag district
रुद्रप्रयाग: यूं तो समूचा उत्तराखंड ही आपदा की दृष्टि से संवेदनशील है और भूस्खलन होना तो यहां आम बात है। बरसात के साथ लगातार गिरती पहाड़ियां, दरकते पत्थर, मलबा, यह सब साक्ष्य हैं कि उत्तराखंड के पहाड़ किसी भी समय अपना रौद्र रूप दिखा सकते हैं।
Rudraprayag District Landslide Report
इस बीच एक रिपोर्ट आई है, इसरो की, जिसके मुताबिक हालिया अध्ययन में पता लगा है कि उत्तराखंड का रुद्रप्रयाग जिला भारत का सर्वाधिक भूस्खलन संवेदनशील जिला है। इसके अलावा यहां भूस्खलन घनत्व भी सबसे अधिक है। 2013 में रुद्रप्रयाग ने जो झेला था, वो भुलाए नहीं भूलता, और उसपर भी इसरो का दावा करना कि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले, जहां साक्षात भोलेनाथ निवास करते हैं, जो भगवान रुद्र की नगरी है, हिंदू धर्म की आस्था का केन्द्र है, यहां सबसे अधिक भूस्खलन होता है। यहां केदारनाथ, तुंगनाथ, त्रियुगीनारायण, टपकेश्वर समेत न जाने कितने ही मंदिर मौजूद हैं, जहां दर्शन करने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बीच ISRO की एक रिपोर्ट ने रुद्रप्रयाग वासियों के पैरों तले जमीन खिसका दी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के हालिया अध्ययन में उत्तराखंड का रुद्रप्रयाग जिला भारत का सर्वाधिक भूस्खलन संवेदनशील जिला है। यहां भूस्खलन घनत्व भी सबसे अधिक है. साथ ही प्रभावित होने वाली कुल आबादी, कामकाजी आबादी और घरों की संख्या में सबसे अधिक है। आगे पढ़िए
अब थोड़ा साइंटिफ़िक टर्म्स में बात करते हैं। रुद्रप्रयाग जिला मेन सेंट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) पर है। भूकंपीय मानचित्र में यह जोन 5 में आता है। यह आपदा, भूस्खलन के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। यही वजह है कि यहां आए दिन कोई न कोई हादसे होते ही रहते हैं। रुद्रप्रयाग जिले में सबसे ज्यादा ऊखीमठ क्षेत्र आपदाग्रस्त है। यहां सामजिक व आर्थिक रूप से लोगों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ा है।
रुद्रप्रयाग के हिस्से आई हैं कई आपदाएँ
यह पहली बार नहीं है कि रुद्रप्रयाग में इस तरह की घटना हुई है। 1804 में गढ़वाल क्षेत्र में आए 8.0 रिएक्टर स्केल के भूकंप से यहां भारी तबाही हुई थी। इसके बाद 1961, 1979, 1991 में आई आपदा में लोगों की जान चली गई। 1998 में भूस्खलन से ऊखीमठ क्षेत्र में तबाही देखने को मिली थी, जिसमें 103 लोग मौत के मुंह में समा गए थे, वहीं 47 गांव के 1927 परिवार प्रभावित हुए। इसके बाद फाटा में हुए भूस्खलन में 28 लोगों की मौत हुई और 15 गांव व 848 परिवार प्रभावित हुए। वहीं 2012 में ऊखीमठ क्षेत्र में एक बार फिर 21 गांव के 69 लोग काल के मुंह मे समा गए। इसके बाद 2013 की भीषण आपदा आई जिसने सैकड़ों ज़िन्दगियों को तबाह कर दिया। 2023 में गौरीकुंड में भूस्खलन में 19 लोग लापता हो गए।