उत्तराखंड हाईकोर्ट ने UKPSC द्वारा सहायक प्रोफेसर (रसायन) भर्ती में दो अभ्यर्थियों के आवेदन निरस्त करने का आदेश रद्द कर दिया। आयोग को आवेदन का पुनर्मूल्यांकन करने और एक लाख रुपये व्यय देने का निर्देश दिया गया।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: High Court Quashes UKPSC Application Rejection
नैनीताल: सरकारी कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर (रसायन) भर्ती से जुड़े एक अहम मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (UKPSC) को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट ने आयोग द्वारा दो अभ्यर्थियों के आवेदन निरस्त करने के आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया और आयोग को चार सप्ताह के भीतर दोनों याचिकाकर्ताओं को एक लाख रुपये व्यय (कॉस्ट) के रूप में देने का निर्देश दिया है।
Uttarakhand High Court Quashes UKPSC Application Rejection
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने अभ्यर्थी नीलम आर्य और सुमन लता पाल की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि सहायक प्रोफेसर (रसायन) के पद के लिए उनकी उम्मीदवारी खारिज करना कानून के अनुरूप नहीं था।
पीएचडी के विषय को लेकर हुआ था विवाद
मामले की जड़ में डॉ. नीलम आर्य की कृषि रसायन (Agricultural Chemistry) में पीएचडी थी। आयोग का कहना था कि पीएचडी स्पष्ट रूप से रसायन शास्त्र (Chemistry) विषय में होनी चाहिए। जबकि अभ्यर्थी के पास रसायन शास्त्र में एमएससी की डिग्री थी। आगे पढ़िए..
कोर्ट ने पाया कि भर्ती विज्ञापन और यूजीसी नियमों में कहीं भी यह शर्त नहीं थी कि पीएचडी केवल रसायन शास्त्र विषय में ही होनी चाहिए।
यूजीसी नियमों में ऐसी कोई बाध्यता नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा अपनाए गए यूजीसी नियमों के अनुसार, यदि अभ्यर्थी की स्नातकोत्तर (एमएससी) डिग्री विज्ञापन में निर्धारित विषय के अनुरूप है, तो पीएचडी किसी विशिष्ट विषय में होना अनिवार्य नहीं है। आयोग ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान ऐसी अतिरिक्त शर्त जोड़ दी, जिसका विज्ञापन में कोई उल्लेख नहीं था।
भर्ती प्रक्रिया के बीच नियम बदलना गलत
खंडपीठ ने कहा कि चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद पात्रता की शर्तों में बदलाव करना निष्पक्षता और पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है। नियुक्ति प्रक्रिया केवल उन्हीं योग्यताओं के आधार पर होनी चाहिए, जो भर्ती विज्ञापन में प्रकाशित की गई थीं।
आवेदन का दोबारा मूल्यांकन करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया कि दोनों अभ्यर्थियों के आवेदन का केवल विज्ञापन में निर्धारित योग्यताओं के आधार पर पुनर्मूल्यांकन किया जाए। यदि वे पात्र पाए जाते हैं और रिक्त पद उपलब्ध हैं, तो उनके नाम राज्य सरकार को नियुक्ति के लिए भेजे जाएं। साथ ही अदालत ने आयोग को आदेश दिया कि दोनों याचिकाकर्ताओं को चार सप्ताह के भीतर एक लाख रुपये व्यय के रूप में अदा किए जाएं।