उत्तराखंड में शहर हो या पहाड़..लोग एक बात से बड़े परेशान हैं और वो हैं बंदर। मामला जरा सीरियस इसलिए है क्योंकि बंदरों की वजह से सरकारी स्कूल खंडहर बन गया है।
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रश्मि पुनेठा
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Image: monkey creating problams in uttarakhand
हरिद्वार: उत्तराखंड में पहाड़ हो या शहर...बंदरों की वजह से हर कोई परेशान है। लगभग हर एक शख्स बंदरों के आतंक से परेशान है। कभी बंदर इंसान पर झपट पड़ते हैं, कभी छोटे छोटे बच्चों के शरीर पर गहरे घाव दे जाते हैं, कभी फसलें चौपट कर जाते हैं, तो कभी बेधड़क घरों के भीतर घुस जाते हैं। अब आप हरिद्वार के खैरीकलां की ही बात कर लीजिए। वहां 30 साल पहले बना एक सरकारी स्कूल अब खंडहर बन गया है। इस राजकीय प्राथमिक विद्यालय को जंगली जानवरों और बंदरों के आतंक की वजह से ही बंद करना पड़ा। अब रख रखाव के अभाव में लाखों की लागत से बना ये स्कूल खंडहर में तब्दील हो गया है। खैरीकलां के जंगल से सटे एक छोर पर तीन दशक पहले ही प्राथमिक विद्यालय बनाया गया था। दो तीन साल तक स्कूल सही ढंग से चला लेकिन धीरे धीरे यहां बंदरों का आतंक बढ़ गया।
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साथ में जंगली जानवरों की धमक से छात्रों और अध्यापकों के दिलों में खौफ बस गया। कभी बंदर स्कूली बच्चों पर झपटते तो कभी स्कूल की कक्षाओं में ही उधम मचा देते। ऐसे में डर के मारे अभिभावकों ने भई अपने बच्चों को वहां भेजना ही बंद कर दिया। तब से लेकर आज तक ये स्कूल सिर्फ शोपीस बना हुआ है। स्कूल ना चलने की वजह से भवन जीर्ण-शीर्ण हालत में पहुंच गया है। गांव के उपप्रधान निर्मल रावत ने मीडिया से बातचीत में बताया कि पंचायत प्रतिनिधियों ने ग्राम सभा की बैठक की। इस बैठक में अब फैसला लिया गया है कि स्कूल की जगह पर पंचायत भवन बनेगा। फिलहाल ये प्रस्ताव पास हो गया है तीन दशक से स्कूल यहां संचालित नहीं हो रहा जिस वजह से ये खंडहर में तब्दील हो रहा है। फिलहाल ये जमीन स्कूल के नाम पर है। पंचायत की ओर से शिक्षा विभाग को प्रस्ताव भेजा जाता है तो ये जमीन पंचायत को हस्तांतरित की जा सकती है।
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उधर रुद्रप्रयाग, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, बागेश्वर, नैनीताल जिलों में भी कमोबेश ये ही हाल है। बंदरों के आतंक के आगे वन विभाग पूरी तरह नतमस्तक है। भले ही बंदरों को पकड़ने के लिए वन विभाग ने अभियान चलाया हो, लेकिन ये भी महज दिखावा ही साबित हो रहा है। कोई भी शहर, कस्बा या गांव ऐसा नहीं है जहां से बंदरों के आतंक से निजात मिली हो। रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि, गुप्तकाशी, ऊखीमठ, जखोली, तिलवाड़ा समेत अन्य कस्बों के लोग भी बंदरों के आतंक से परेशान हैं। भले ही वन विभाग दावा कर रहा हो कि अब तक हजारों बंदर पकड़ कर जंगलों में छोड़े गये हैं, लेकिन कहीं भी बंदरों की संख्या में कोई कमी नहीं आई। अब हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि स्कूल के स्कूल खाली हो रहे हैं। निपटें किससे ? पलायन की मार से या बंदरों के आतंक से?