उत्तराखंड की संतोष देवी...92 साल की उम्र...बेसहारा हैं लेकिन मेहनत से लिखी नई इबारत

उत्तराखंड की 92 साल की संतोष देवी वो बेसहारा हैं, लेकिन मांग कर खाने की बजाय उन्होंने मेहनत करने का फैसला किया, ये फैसला ही उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करता है।
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उत्तराखंड. उत्तराखंड न्यूज: story of santosh devi of uttarakhand haridwar
Image: story of santosh devi of uttarakhand haridwar

हरिद्वार: झुर्रियों से भरा चेहरा, झुकी हुई कमर...हाथ में लाठी बुजुर्ग संतोष देवी इसी पहचान के सहारे जी सकती थीं, लेकिन 92 साल की उम्र में जब अपनों ने उन से नाता तोड़ लिया तो उन्होंने भी किसी के रहमोकरम पर ना जीने की ठान ली। 92 साल की संतोष देवी उम्र के इस दौर में भी अपने पैरों पर खड़ी हैं। वो हरिद्वार की हरकी पैड़ी में दिनभर थैले बेचती हैं, ताकि किसी तरह पेट भरा जा सके। संतोष की जिंदगी हमेशा से संघर्षों भरी रही। एक वेबसाइट में छपी खबर के मुताबिक संतोष देवी की जिंदगी में एक वक्त था जब उनके पास घर, जमीन सब कुछ था, लेकिन बेटी ने उन्हें धोखा दे दिया। मां की सारी संपत्ति हड़प कर बेटी अपने पति के साथ चली गईं, और पीछे रह गईं बुजुर्ग संतोष देवी। सबको लगा कि संतोष अब जिंदगी की जंग हार जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, वो हरिद्वार आईं और कपड़े के थैले बेचना शुरू कर दिया। उनकी कहानी युवाओं को भी स्वावलंबी बनने की प्रेरणा देती है।

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संतोष देवी एक ऐसी मेहनतकश महिला हैं, जिन्हें किसी से मांग कर खाना कभी पसंद नहीं था, यही वजह है कि सब से रिश्ते-नाते टूटने के बाद वो हरिद्वार चली आईं और दिन भर धूप, गर्मी और ठंड सहते हुए थैले बेचने लगीं। वो संजय पुल के प्लेटफार्म पर रहती हैं। संतोष कहती हैं कि पहले उन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिलती थी, लेकिन किसी ने पेंशन बंद करा दी। अब वो थैले बेचकर किसी तरह गुजारा कर रही हैं। उम्र के जिस पड़ाव में उन्हें सहारे की जरूरत थी, उनकी बेटी ने उनका साथ छोड़ दिया। वो बेसहारा होकर दर-दर की ठोकरें खाने लगीं, रिश्तों के इस धोखे को उन्होंने अपनी कमजोरी ना बनाकर ताकत बनाया और आज वो अपने दम पर जिंदगी जी रहीं है। अपने इस हौसले से संतोष उन लोगों के लिए मिसाल बन गईं हैं, जो कभी उम्र तो कभी परिस्थितियों का हवाला देकर जिंदगी की जंग में हार मान लिया करते हैं।