पंतनगर विश्वविद्यालय के शोध में उत्तराखंड के मालू के रेशों से विस्कोस मिश्रित कपड़ा तैयार किया गया है, जिसे पेटेंट मिल चुका है। इस तकनीक से पर्यावरण अनुकूल वस्त्रों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Malu Plant in Uttarakhand Gets New Use in Eco-Friendly Fabric
रुद्रपुर: उत्तराखंड के पहाड़ों में बहुतायत से पाए जाने वाले मालू के पौधे से अब पर्यावरण अनुकूल कपड़ा तैयार किया जा सकेगा। जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों ने मालू के रेशों और विस्कोस रेयान को मिलाकर मिश्रित कपड़ा विकसित किया है। इस नवाचार को भारत सरकार से पेटेंट भी मिल चुका है। इससे पर्वतीय वनस्पतियों के व्यावसायिक उपयोग के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
Malu Plant in Uttarakhand Gets New Use in Eco-Friendly Fabric
अब तक मालू के पौधे का इस्तेमाल मुख्य रूप से रस्सियां बनाने, पत्तल तैयार करने और प्रसिद्ध पहाड़ी मिठाई सिंगौड़ी की पैकिंग में किया जाता रहा है। लेकिन पंतनगर विश्वविद्यालय के शोध ने इस पारंपरिक वनस्पति के उपयोग को वस्त्र उद्योग तक पहुंचाने की नई राह खोली है। विश्वविद्यालय के सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय की पूर्व पीएचडी छात्रा और वर्तमान में निफ्ट जोधपुर में सहायक प्राध्यापक डॉ. रुचि खोलिया ने महाविद्यालय की अधिष्ठात्री प्रो. अलका गोयल के मार्गदर्शन में यह शोध किया। उनके शोध में मालू के रेशों को अलग करने और उन्हें विस्कोस रेयान के साथ मिलाकर नया मिश्रित कपड़ा विकसित करने पर काम किया गया। इस नवाचार को बीते सितंबर में पेटेंट मिला।
फर्निशिंग और टेक्सटाइल उद्योग में होगा उपयोग
डॉ. रुचि खोलिया के अनुसार, मालू के बास्ट रेशों को विस्कोस रेयान के साथ मिलाकर उच्च गुणवत्ता वाला मिश्रित कपड़ा तैयार किया गया है। इस तकनीक से मालू के रेशों को घरेलू सजावट, फर्निशिंग फैब्रिक और टेक्सटाइल उत्पादों में इस्तेमाल करने की संभावनाएं बढ़ेंगी। यह नवाचार प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ पर्यावरण अनुकूल वस्त्रों के विकास में भी मददगार हो सकता है। इससे स्थानीय वनस्पतियों पर आधारित टिकाऊ उत्पाद तैयार करने और पारंपरिक संसाधनों को नए बाजारों से जोड़ने का अवसर मिलेगा। आगे पढ़िए..
ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को मिल सकते हैं रोजगार के अवसर
मालू के रेशों के निष्कर्षण और प्रसंस्करण पर आधारित लघु एवं कुटीर उद्योग स्थापित किए जाने से उत्तराखंड के ग्रामीण, पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों में स्वरोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। डॉ. खोलिया के मुताबिक, इस तकनीक के आधार पर कम लागत वाले उद्यम विकसित कर ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को आजीविका के नए साधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, पर्वतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती और पलायन कम करने के प्रयासों को मदद मिल सकती है। हालांकि, इन संभावनाओं को वास्तविक रोजगार में बदलने के लिए मालू के संग्रह, रेशे निकालने, प्रसंस्करण, उत्पादन और बाजार तक पहुंच की प्रभावी व्यवस्था विकसित करना भी जरूरी होगा।
औषधीय उपयोग के लिए भी जाना जाता है मालू
मालू को अंग्रेजी में कैमल्स फुट क्लाइंबर भी कहा जाता है। डॉ. खोलिया ने इसके औषधीय उपयोगों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इसके पत्तों का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से रक्त शर्करा नियंत्रण और बीजों का उपयोग स्वास्थ्य टॉनिक के रूप में किया जाता है। मालू के रेशों से कपड़ा बनाने का यह प्रयोग हिमालयी वनस्पतियों के बहुआयामी उपयोग की दिशा में एक नया कदम है। हालांकि, इसके औषधीय उपयोगों और प्रभावों के लिए वैज्ञानिक प्रमाणों को अलग से देखना आवश्यक है।
हरित तकनीक और सतत फैशन को मिलेगा बढ़ावा
पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एसके कश्यप ने इस नवाचार को हरित प्रौद्योगिकी, सतत फैशन और ग्रामीण पुनरुद्धार के लक्ष्यों के अनुरूप बताया। उन्होंने कहा कि स्थानीय जंगली वनस्पतियों को व्यावसायिक वस्त्र उत्पादों में बदलने से शैक्षणिक अनुसंधान, पर्यावरणीय स्थिरता और सामुदायिक सशक्तिकरण के बीच बेहतर संबंध स्थापित हो सकता है।
मालू से कपड़ा बनाने की यह तकनीक उत्तराखंड के पारंपरिक प्राकृतिक संसाधनों को नया व्यावसायिक महत्व देने की क्षमता रखती है। यदि इसके उत्पादन और विपणन को स्थानीय स्तर पर विकसित किया जाता है, तो यह पर्वतीय क्षेत्रों में टिकाऊ आजीविका के नए रास्ते खोल सकती है।