उत्तराखंड की मां ज्वालपा देवी, जहां अखंड ज्योति के दर्शन से ही हर मनोकामना पूरी होती है

कहते हैं आस्था में बड़ी ताकत है। देवभूमि की भगवती ज्वालपा देवी। थपलियाल और बिष्ट जाति के लोगों की कुलदेवी में असीम ताकत है।
Advertisement Untouched Trekking Routes in Kedar Himalaya, Uttarakhand

Lesser-known treks offering breathtaking Himalayan views. A perfect blend of adventure, solitude, and spirituality.

Example Ads Media
jwalpa devi: maa jwalpa devi of uttarakhand
Image: maa jwalpa devi of uttarakhand

: उत्तराखंड में आपको कदम कदम पर वो मंदिर दिखेंगे, जिनके रहस्यों और कहानियों का कोई अंत नहीं। थपलियाल और बिष्ट जाति के लोगों की कुलदेवी हैं मां ज्वालपा भगवती। आज हम आपको मां ज्वाल्पा देवी के बारे में बताने जा रहे हैं। पौड़ी-कोटद्वार मार्ग पर नयार नदी के किनारे स्थित है मां ज्वाल्पा देवी का सिद्ध पीठ। इस सिद्ध पीठ का पौराणिक महत्व विशाल है। इस पवित्र धाम के बारे में एक बात कही जाती है कि है कि यहां सच्चे मन से मां भगवती की आराधना करने पर मन की हर इच्छा पूरी होती है। ज्वालपा देवी मंदिर पौड़ी से 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नवालिका नदी यानी नयार नदी के बाएं किनारे पर स्थित ये मंदिर 350 मीटर के क्षेत्र में फैला है। नवरात्रि के दौरान इस मंदिर का भव्य नज़ारा देखने के लिए देश और दुनियाभर से लोग आते हैं। इस मंदिर की कहानी पुलोम नाम के राक्षस से जुड़ी है।

यह भी पढें - देवभूमि की देवी राज राजेश्वरी..अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और UAE तक जाती है इस मंदिर की भभूत
ज्वाल्पा देवी के बारे में कहा जाता है कि एक बार पुलोम नाम के राक्षस की कन्या सुची ने इंद्र को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए नयार नदी के किनारे तप किया था। सुची की तपस्या से खुश होकर इसी स्थान पर मां भगवती ज्वाला यानी अग्नि के रूप में प्रकट हुईं। इसके बाद मां ने राक्षस की कन्या सुची को उसकी मनोकामना पूर्ण का वरदान दिया। ज्वाला रूप में दर्शन देने की वजह से इस स्थान का नाम ज्वालपा देवी पड़ा था। देवी पार्वती के दीप्तिमान ज्वाला के रूप में प्रकट हुई थी तो वो अखंड दीपक तबसे निरंतर मंदिर में प्रज्ज्वलित रहता है। इस परंपरा को जारी रखने के लिए तबसे से कफोलस्यूं, मवालस्यूं, रिंगवाडस्यूं, खातस्यूं, घुड़दौड़स्यूं और गुराडस्यूं पट्टयों के गांवों से तेल की व्यवस्था होती है। इन गांवों के खेतों में सरसों उगाई जाती है और अखंड दीप को प्रज्ज्वलित रखने के लिए तेल की व्यवस्था की जाती है।

यह भी पढें - कालीशिला...देवभूमि का सिद्धपीठ, जहां देवी ने 12 साल की कन्या के रूप में जन्म लिया
कहा ये भी जाता है कि आदिगुरू शंकराचार्य ने यहां मां की पूजा की थी, तब मां ने उन्हे दर्शन दिए। बताया जाता है कि 18वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा प्रद्युम्न शाह ने ज्वाल्पा मंदिर को 11.82 एकड़ जमीन दान दी थी। वजह ये थी कि यहां अखंड दीपक के लिए तेल की व्यवस्था के लिए सरसों का उत्पादन हो सके। मंदिर के एक तरफ मोटर मार्ग और दूसरी ओर नयार नदी बहती है। ये खूबसूरत नज़ारा देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। इस सिद्धपीठ में चैत्र और शारदीय नवरात्रों में विशेष पाठ का आयोजन होता है। इस मौके पर देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। खासतौर पर अविवाहित कन्याएं सुयोग्य वर की कामना लेकर आती हैं। ज्वाल्पा थपलियाल और बिष्ट जाति के लोगों की कुलदेवी है। कहा गया है कि मां ज्वालपा का मंदिर धरती के के सबसे जागृत मंदिरों में से एक है।