अल्मोड़ा जिले में स्थित सोमेश्वर के कुछ युवाओं ने लगभग 3 साल पहले मिश्रित वन बनाने की मुहिम की शुरुआत की थी जिसके सफल परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
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Komal Negi
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Image: Youth adopted forest in Almora
अल्मोड़ा: आज हम बात करने जा रहे हैं उत्तराखंड के उन युवाओं की जिन्होंने 3 वर्ष पहले प्रकृति संरक्षण करने की ठानी थी और आज उनका सपना साकार होता हुआ दिख रहा है। प्रकृति को बचाना कितना जरूरी है यह तो हम सबको पता ही है। पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण की ऐसी ही एक मिसाल दी है उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले स्थित सोमेश्वर के युवाओं ने। व्यसस्ता भरी जिंदगी में से यह युवा प्रतिदिन कुछ पल प्रकृति के हवाले कर रहे हैं जिसके शानदार परिणाम दिख रहे हैं। सोमेश्वर के कुछ युवाओं ने समाज के सामने प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण की एक अनूठी मिसाल पेश की है। सोमेश्वर के युवाओं ने लगभग 3 साल पहले वन विभाग से अर्जुनराठ गांव से लगी देवरिया की पहाड़ी चीड़ वन क्षेत्र को गोद लिया था। उनका मकसद था उसी जंगल को मिश्रित जंगलात में बदलना जहां पर चीड़ के अलावा भी कई पेड़ हों।युवाओं की टोली ने तकरीबन 3 वर्ष पूर्व जो मुहिम छेड़ी थी उसके सफल परिणाम अब सबके सामने हैं। अब उस जगह पर युवाओं की मेहनत से हरियाली वापस लौट चुकी है। गांव वालों ने भी युवकों की मेहनत की बहुत सराहना की है।
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मिश्रित जंगलात होने के कारण जंगल को आग से बचाया जा रहा है और इसी के साथ बंदर और लंगूर और से भी फसलों को बचाने के लिए युवाओं द्वारा फलीकरण की मुहिम शुरू कर दी है। वाकई में यह किसी अनोखी मिसाल से कम नहीं है। एक छोटे से समूह से शुरुआत कर सोमेश्वर के युवाओं ने एक सराहनीय काम को अंजाम दिया है। मिश्रित जंगलात विकसित होने के साथ ही कोसी नदी के सहायक जलस्रोतों का प्रवाह भी बढ़ने लगा है। बता दें गांव के कुछ पर्यावरण प्रेमियों ने 2017 में अर्जुनराठ गांव के पास दुर्गड़िया के चीड़ के जंगल को संवारने का जनक गांव के पास दुर्घटना वन क्षेत्र को मिश्रित जंगलात बनाने का संकल्प लिया और वन विभाग के पास पत्र भेजकर वनाग्नि के बड़े कारण चीड़ के जंगल गोद लेने का आग्रह किया और उसे एक मिश्रित जंगल में तब्दील करने की अनुमति मांगी। युवाओं का जुनून और मेहनती स्वभाव देखकर विभाग ने वन क्षेत्र को उन को हरा -भरा बनाने की अनुमति प्रदान कर दी
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विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2017 को तकरीबन 25 युवाओं ने पौधा रोपण की बड़ी मुहिम चलाई जो कि बेहद बड़े स्तर पर कामयाब हुई। उन्होंने तब काफल, बुरांश, उतीश, बांज, आदि विभिन्न प्रजातियों के 2000 पौधे लगाए। अगले ही वर्ष उनको परिणाम बेहतरीन मिला तो युवाओं ने 2018 में तकरीबन एक हजार और अन्य बहुऊपयोगी पौधे लगाए। बंदर और लंगूर किसानों की फसलों को तबाह कर देते हैं इसलिए उनसे बचाने के लिए युवाओं ने फल के पौधों को भी प्राथमिकता दी। अब युवाओं का अगले वर्ष दोबारा 1000 फल और अन्य पौधे लगाकर कोसी नदी को बचाने और जल स्रोतों को जिंदा रखने का अभियान भी बरकरार है। ग्रुप के सदस्य शिवेंद्र सिंह, भगवंत सिंह, शंकर सिंह, त्रिभुवन सिंह मनोज इत्यादि का कहना है कि पहाड़ के अन्य गांवों में भी इस तरह के पर्यावरण संरक्षण के छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर आसपास के वनों की और प्रकृति की हिफाजत की जा सकती है और हरियाली को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।