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जहां आज भी सिर्फ चरवाहे जाते हैं – केदार हिमालय के अनदेखे ट्रेक्स
प्रकृति, शांति और हिमालय – केदार के गुप्त ट्रेक्स.. यहां कदम रखते ही बदल जाती है सांस और सोच – Hidden Kedar Trails
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उधमसिंह नगर: देहदान। एक ऐसा विषय जिस पर आज भी लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। मरने के बाद शरीर खाक में मिल जाता है, किसी के काम नहीं आ पाता। वहीं, देशभर के मेडिकल स्टूडेंट्स पढ़ाई के दौरान बॉडी न मिल पाने की समस्या से जूझते रहते हैं। अगर यही शरीर हम दान कर दें, तो मरने के बाद भी हम समाज को बेहतर डॉक्टर देने में मददगार साबित हो सकते हैं। काशीपुर की हेमा देवी इस बात को समझती थीं। तभी तो मरने से पहले उन्होंने देह दान करने का फैसला किया। कुछ दिन पहले हेमा देवी का निधन हो गया। तब उनके परिजनों ने हेमा देवी की इच्छानुसार उनका पार्थिव शरीर तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी मुरादाबाद से आई टीम को सौंप दिया। मेडिकल रिसर्च के लिए देह दान करने वाली हेमा देवी दूसरे लोगों के लिए मिसाल बन गई हैं। हेमा उत्तराखंड के बाजपुर के भौना इस्लामनगर क्षेत्र में रहती थीं। 80 साल की होने के बाद भी हेमा समाज की बेहतरी के लिए कुछ करना चाहती थीं। उन्होंने मरणोपरांत देह दान करने की इच्छा जताई थी। अपनी मृत्यु से पूर्व ही हेमा देवी ने देह दान करने का फॉर्म भर दिया था। वो डेरा सच्चा सौदा से जुड़ी हुई थीं और भौना कॉलोनी में अपनी बेटी पार्वती के यहां रहती थीं। आगे पढ़िए