गढ़वाल: रिटायर्ड फौजी ने बदली गांव की तकदीर, 70 प्रजाति के 5 लाख पेड़ों का जंगल बनाया

बीते चार दशकों में जगत सिंह जंगली ने एक ऐसे मिश्रित वन को विकसित किया, जिसमें पांच लाख से अधिक पेड़ हैं। पढ़िए Story of Jagat Singh Junglee
Advertisement हजारों वर्षों से जलती अखंड ज्योति के सामने सात फेरे - आस्था, परंपरा और प्रकृति का अनोखा संगम

पहाड़, मंत्र और देवभूमि का आशीर्वाद.. त्रियुगीनारायण में शादी सिर्फ एक समारोह नहीं, आध्यात्मिक अनुभव है।

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Jagat Singh Junglee: Story of Jagat Singh Junglee of Rudraprayag
Image: Story of Jagat Singh Junglee of Rudraprayag

रुद्रप्रयाग: कमर्शियल एक्टिविटीज के चलते उत्तराखंड की वन संपदा नष्ट होती जा रही है। एक तरफ जहां लोग अपनी जरूरत और स्वार्थ के लिए पेड़ों को काटते चले जा रहे हैं तो वहीं पहाड़ में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने जंगल को बचाने के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगा दिया है। रुद्रप्रयाग के कोटमल्ला गांव के रहने वाले जगत सिंह चौधरी ऐसी ही शख्सियत हैं। इन्होंने बीते चार दशकों में एक ऐसे मिश्रित वन को विकसित किया है, जिसमें देवदार, बांज, चीड़ जैसे 70 तरह के पांच लाख से अधिक पेड़ हैं। जगत सिंह चौधरी रिटायर्ड फौजी हैं। उन्होंने बीते 4 दशकों में अपनी तीन हेक्टेयर बंजर जमीन पर लाखों पेड़ लगाए। उनकी इस कोशिश से पानी के सूख चुके स्त्रोत फिर से जिंदा हो गए। गांव की महिलाओं को जलावन और चारे के लिए दूसरी जगह नहीं जाना पड़ता। जिन खेतों को कभी बंजर समझकर छोड़ दिया गया था, अब उनमें भी खेती होने लगी है। प्रकृति से प्यार करने वाले इस रिटायर्ड फौजी को लोग प्यार से जगत सिंह ‘जंगली’ नाम से बुलाते हैं।

Story of Jagat Singh Junglee

जगत सिंह साल 1967 में बीएसएफ में शामिल हो गए थे। उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी हिस्सा लिया। साल 1974 की बात है। जगत सिंह घर आए हुए थे। इस दौरान उन्होंने देखा कि गांव की महिलाओं को जलावन और पशुओं के चारे के लिए हर सुबह 8-10 किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है। आगे पढ़िए

कई बार पहाड़ से पैर फिसल जाने के कारण महिलाओं की मौत भी हो जाती थी। इन घटनाओं ने जगत सिंह को झकझोर दिया। उन्होंने सोचा कि अगर गांव के आस-पास ही जलावन और घास मिल जाए तो उन्हें दूर नहीं जाना पड़ेगा।यही सोचकर जगत सिंह ने अपनी 1.5 हेक्टेयर जमीन पर पौधे लगाना शुरू कर दिया। साल 1980 में रिटायरमेंट के बाद वो पूरी तरह इस मुहिम में जुट गए। रिटायरमेंट के वक्त मिली रकम का बहुत बड़ा हिस्सा उन्होंने गांव में हरियाली लाने पर खर्च किया। फिलहाल उनका जंगल 3 हेक्टेयर से अधिक दायरे में फैला हुआ है, जिसमें पानी को जमा करने के लिए 200 से भी अधिक छोटे बांध बने हैं। इस जंगल में रिंगाल बड़े पैमाने पर मिलते हैं, जिससे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। 73 वर्षीय जगत 3 बेटियों और एक बेटे के पिता हैं। उनके बेटे राघवेंद्र को भी जंगल से लगाव है। पर्यावरण विज्ञान से एमएससी करने के बाद वो पिता की मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। जगत सिंह को पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए इंदिरा गांधी वृक्ष मित्र पुरस्कार और आर्यभट्ट पुरस्कार जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें उत्तराखंड में वन विभाग का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया गया है।