उत्तराखंड पेयजल निगम के नए SOR में मीटर सेक्शन से जुड़े नियमों में बदलाव को लेकर विवाद। MID प्रमाणपत्र अनिवार्य करने से स्थानीय निर्माताओं को नुकसान और विदेशी कंपनियों को लाभ दिलाने के आरोप।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: SOR Controversy in Uttarakhand Peyjal Nigam
देहरादून: उत्तराखंड पेयजल निगम एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गया है। निगम पर आरोप लग रहे हैं कि नए SOR (Schedule of Rates) में मीटर सेक्शन से जुड़े नियमों में ऐसे बदलाव किए गए हैं, जिनसे स्थानीय और भारतीय निर्माताओं को नुकसान और विदेशी कंपनियों को सीधा लाभ मिल रहा है। इस मामले ने अब ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसी नीतियों की भावना पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
SOR Controversy in Uttarakhand Peyjal Nigam
सूत्रों के अनुसार, नए SOR में MID (विदेशी मानक) से संबंधित प्रमाणपत्र को जानबूझकर अनिवार्य कर दिया गया है। उद्योग जगत का कहना है कि भारत में इसकी वास्तविक आवश्यकता सीमित है, जबकि यह प्रमाणपत्र सामान्यतः विदेशी कंपनियों के पास आसानी से उपलब्ध होता है। आरोप है कि इस शर्त के लागू होने से देश में निर्मित मीटरों को योजनाबद्ध तरीके से अयोग्य घोषित कर दिया गया, जिससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा कमजोर हो गई।
नीतियों पर सवाल: ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ को चुनौती?
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब केंद्र सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्वदेशी उत्पादन, आत्मनिर्भर भारत और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने की बात कर रही है। वहीं उत्तराखंड सरकार भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को प्रोत्साहित कर रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि उत्तराखंड पेयजल निगम का नया SOR किस दिशा में जा रहा है और यह बदलाव किसके हित में किया गया।
मीटरों की कीमत बढ़ी, लागत में उछाल
आरोपों का सबसे बड़ा असर आर्थिक मोर्चे पर दिख रहा है। स्थानीय निर्माताओं का कहना है कि नए नियमों के बाद विदेशी मीटरों की खरीद बढ़ी, जो तुलनात्मक रूप से महंगे हैं। इससे जल परियोजनाओं की लागत में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, जिसका दबाव अंततः आम जनता पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लागत इसी तरह बढ़ती रही, तो इसका असर सरकारी बजट, योजनाओं की गति और उपभोक्ताओं के खर्च पर भी पड़ सकता है।
अधिकारियों की भूमिका पर सवाल, जांच की मांग तेज
सूत्रों का दावा है कि इस बदलाव के पीछे कुछ अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप है कि नियमों में बदलाव को तकनीकी जरूरत बताकर पेश किया गया, लेकिन इससे लाभ कुछ चुनिंदा कंपनियों तक सीमित हो गया। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ नीतिगत गलती नहीं बल्कि हितों के टकराव और संभावित भ्रष्टाचार की श्रेणी में भी आ सकता है।
चेतावनी: स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर
स्थानीय उद्योगों का कहना है कि यदि सरकारी खरीद प्रक्रिया में इसी तरह के बदलाव जारी रहे, तो उत्तराखंड में लोकल इंडस्ट्री कमजोर हो जाएगी और राज्य विदेशी उत्पादों पर निर्भर होता चला जाएगा।
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अब उठ रहे हैं ये बड़े सवाल
Image: Uttarakhand Peyjal Nigam SOR Controversy
क्या राज्य सरकार इस पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप करेगी? क्या नए SOR में किए गए बदलावों की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच होगी? क्या स्थानीय और भारतीय निर्माताओं को समान अवसर देने के लिए नियमों की समीक्षा की जाएगी? उत्तराखंड पेयजल निगम की इन नई नीतियों से राज्य में रोजगार, निवेश और स्थानीय उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है। जनता और उत्तराखंड का स्थानीय उद्योग जगत दोनों अब इस मुद्दे पर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।