उत्तराखंड में ग्लेशियरों और जल स्रोतों पर संकट बढ़ गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक यदि अगले महीनों में भी पर्याप्त बर्फबारी नहीं हुई, तो गर्मियों में राज्य में बड़ा पेयजल संकट खड़ा हो सकता है।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Uttarakhand Water Crisis Alert 2026
देहरादून: उत्तराखंड में इस बार सर्दियों का मौसम सामान्य नहीं रहा। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी जरूर हुई है, लेकिन विशेषज्ञ इसे पर्याप्त नहीं मान रहे। वजह साफ है—नवंबर के बाद दिसंबर और फिर जनवरी के शुरुआती तीन हफ्ते तक राज्य में बारिश-बर्फबारी लगभग न के बराबर रही, जिससे ग्लेशियरों, जलधाराओं और प्राकृतिक जल स्रोतों पर खतरा बढ़ गया है। जानकारों का कहना है कि यदि अगले महीनों में भी मौसम सामान्य नहीं हुआ, तो गर्मियों में उत्तराखंड को बड़े पेयजल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
Uttarakhand Water Crisis Alert 2026
भू-वैज्ञानिक और उत्तराखंड अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र के पूर्व निदेशक एमपीएस बिष्ट के अनुसार, ग्लेशियरों के लिए नवंबर-दिसंबर में बर्फबारी बेहद अहम होती है। उनका कहना है कि शुरुआती महीनों में गिरने वाली बर्फ धीरे-धीरे जमती है और ऊंची चोटियों पर परतें बनाकर ग्लेशियर को मजबूती और पोषण देती है। लेकिन जब बर्फबारी देर से होती है, तो वह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाती और जल्दी पिघल जाती है, जिससे ग्लेशियरों को अपेक्षित “फीड” नहीं मिल पाता। यही कारण है कि इस बार हुई बर्फबारी को वैज्ञानिक ग्लेशियर के लिहाज से कमजोर मान रहे हैं।
सर्दियों में बारिश-बर्फबारी का पैटर्न क्यों बिगड़ा?
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है। पहले जहां सर्दियों में नियमित पश्चिमी विक्षोभ आते थे, वहीं अब बारिश-बर्फबारी का सिस्टम असंतुलित हो गया है। इसका असर उत्तराखंड में साफ दिखा, जब नवंबर-दिसंबर सूखे रहे और जनवरी के शुरुआती हफ्तों में भी बारिश नहीं हुई। मौसम के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार 1 नवंबर से 20 जनवरी तक उत्तराखंड में शून्य बारिश दर्ज हुई, जबकि अन्य हिमालयी राज्यों में इस अवधि में कुछ न कुछ बारिश रिकॉर्ड की गई। जनवरी में भी 1 से 21 जनवरी के बीच उत्तराखंड में कहीं बारिश दर्ज नहीं हुई। विशेषज्ञ इसे पिछले 10 वर्षों में दुर्लभ स्थिति मान रहे हैं।
जल स्रोतों पर असर
जियोलॉजिस्ट प्रो. एसपी सती के अनुसार, समय पर बर्फबारी न होने से जमीन के भीतर पानी का रिचार्ज नहीं हो पाता। इसका असर सीधे पहाड़ों के पारंपरिक जल स्रोतों पर पड़ता है—जैसे नौले, धाराएं, गाड़-गधेरे और छोटी नदियां। यदि रिचार्ज कमजोर रहा, तो गर्मियों में इन स्रोतों का बहाव घट सकता है और कई इलाकों में पेयजल संकट गहराने की आशंका है।
जल स्रोतों की निगरानी और योजनाएं तेज
पेयजल सचिव रणवीर सिंह चौहान के अनुसार, सरकार पहले से ही जल स्रोतों के संरक्षण पर काम कर रही है, लेकिन मौजूदा मौसम को देखते हुए अब और ज्यादा सतर्कता जरूरी है। उन्होंने कहा कि गर्मियों में पेयजल संकट न हो, इसके लिए विभागीय स्तर पर योजनाएं तैयार की जा रही हैं और जल स्रोतों की निगरानी बढ़ाई जा रही है।
23 जनवरी की बर्फबारी से राहत, लेकिन खतरा टला नहीं
23 जनवरी को ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी जरूर हुई, जिससे कुछ राहत मिली। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह राहत अस्थायी है। अगर आने वाले हफ्तों में लगातार पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं हुआ और बर्फबारी सामान्य नहीं रही, तो इसका असर आने वाले महीनों में साफ नजर आएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि कम बारिश-बर्फबारी का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं रहेगा। इससे खेती-किसानी, बागवानी (खासतौर पर सेब उत्पादन), जलविद्युत परियोजनाएं और पर्यावरण संतुलन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए बर्फबारी केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवनरेखा है। ऐसे में यह स्थिति भविष्य के लिए एक बड़ा अलर्ट मानी जा रही है।