गढ़वाल: 22 दिन पिंजरे में कैद रहा गुलदार, आदेश के इंतजार में चली गई जान; WII रिपोर्ट में नहीं मिला सैंपल

गढ़वाल वन प्रभाग के धुमाकोट रेंज में 22 दिनों तक पिंजरे में कैद रहे गुलदार की मौत हो गई। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में सैंपल मिसमैच होने के बावजूद उसे न रेस्क्यू सेंटर भेजा गया और न ही जंगल में छोड़ा गया।
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Uttarakhand Leopard Dies in Cage: Leopard Dies After 22 Days in Forest Department Cage
Image: Leopard Dies After 22 Days in Forest Department Cage

पौड़ी गढ़वाल: उत्तराखंड के गढ़वाल वन प्रभाग से वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करने वाली घटना सामने आई है। धुमाकोट स्थित दीवा रेंज मुख्यालय में 22 दिनों तक पिंजरे में कैद रहे एक नर गुलदार की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि गुलदार को रेस्क्यू सेंटर भेजने या जंगल में छोड़ने के लिए वन विभाग ने उच्च अधिकारियों से निर्देश मांगे थे, लेकिन समय पर कोई फैसला नहीं लिया गया। इसी बीच गुलदार ने पिंजरे में ही दम तोड़ दिया।

Leopard Dies After 22 Days in Forest Department Cage

27 जून को नैनीडांडा के सल्ड महादेव क्षेत्र के बणासी गांव में 65 वर्षीय सुशीला देवी की गुलदार के हमले में मौत हो गई थी। घटना के बाद वन विभाग ने मौके से सैंपल लेकर वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) भेजे। इसके बाद 3 जुलाई की रात घटनास्थल के पास लगाए गए पिंजरे में एक नर गुलदार कैद हो गया। वन विभाग ने उसे धुमाकोट रेंज मुख्यालय लाकर रखा और उसके सैंपल भी जांच के लिए WII भेजे।

WII रिपोर्ट में नहीं मिला सैंपल

जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि पकड़े गए गुलदार के सैंपल और घटनास्थल से लिए गए सैंपल का मिलान नहीं हुआ। यानी यह पुष्टि नहीं हो सकी कि यही गुलदार महिला पर हमला करने वाला था। इसके बाद गढ़वाल वन प्रभाग के अधिकारियों ने उच्च अधिकारियों से पूछा कि अब गुलदार को रेस्क्यू सेंटर भेजा जाए या जंगल में छोड़ा जाए। लेकिन लंबे समय तक कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिले।

22 दिन पिंजरे में रहने के बाद हुई मौत

निर्देशों का इंतजार करते-करते गुलदार लगातार पिंजरे में बंद रहा। वन विभाग के अनुसार, वह बार-बार पिंजरे में संघर्ष करता रहा और खुद को घायल कर बैठा। उपचार भी कराया गया, लेकिन 25 जुलाई को उसकी मौत हो गई। आगे पढ़िए..

मेडिकल रिपोर्ट में था स्वस्थ, लेकिन आक्रामक

वन विभाग के अनुसार, बणासी गांव से पकड़ा गया नर गुलदार 8 से 10 वर्ष का था। 6 जुलाई को किए गए मेडिकल परीक्षण में वह पूरी तरह स्वस्थ पाया गया था, हालांकि वह काफी आक्रामक था। पशु चिकित्सकों ने अपनी रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसे वन्यजीव को लंबे समय तक पिंजरे में कैद रखना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे उसके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।

पोस्टमार्टम के बाद विसरा सुरक्षित

गढ़वाल के डीएफओ महातिम यादव ने बताया कि गुलदार ने पिंजरे में संघर्ष के दौरान खुद को घायल कर लिया था। उसका इलाज कराया गया, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। वहीं रेंज अधिकारी सुभाष घिल्डियाल ने बताया कि दो पशु चिकित्सकों के पैनल ने गुलदार का पोस्टमार्टम किया है। जांच के लिए विसरा सुरक्षित रख लिया गया है और नियमानुसार शव का निस्तारण कर दिया गया है।

उठ रहे हैं कई सवाल

इस घटना के बाद वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। यदि WII की रिपोर्ट में सैंपल का मिलान नहीं हुआ था, तो समय रहते गुलदार को रेस्क्यू सेंटर भेजने या जंगल में छोड़ने का निर्णय क्यों नहीं लिया गया? वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में त्वरित निर्णय लेना बेहद आवश्यक होता है, ताकि किसी भी वन्यजीव की अनावश्यक मौत न हो।