उत्तराखंड में पहली बार होगी गुलदारों की वैज्ञानिक गणना, मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने पर रहेगा फोकस

उत्तराखंड में पहली बार गुलदारों की वैज्ञानिक गणना की जाएगी। वन विभाग कैमरा ट्रैप, डीएनए विश्लेषण और जीआईएस तकनीक की मदद से गुलदारों की वास्तविक संख्या और उनके आवास का आकलन करेगा।
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Uttarakhand Leopard Census 2026: First Scientific Leopard Survey in Uttarakhand
Image: First Scientific Leopard Survey in Uttarakhand

देहरादून: उत्तराखंड में अब तक केवल बाघों की वैज्ञानिक गणना की जाती थी, लेकिन पहली बार वन विभाग ने गुलदारों की भी वैज्ञानिक गणना करने का फैसला लिया है। इसके लिए मुख्यालय स्तर से मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की जा रही है। एसओपी जारी होते ही सभी जिलों में सर्वेक्षण शुरू कर दिया जाएगा।

First Scientific Leopard Survey in Uttarakhand

उत्तराखंड में लगभग 37,999 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है और राज्य का करीब 71 प्रतिशत भू-भाग जंगलों से आच्छादित है। वन विभाग प्रदेश के सभी 95 विकासखंडों के वन क्षेत्रों में वैज्ञानिक सर्वे करेगा। अब तक जिलों में केवल पगमार्क (पैरों के निशान) के आधार पर गुलदारों की अनुमानित संख्या दर्ज की जाती थी, लेकिन नई प्रणाली में आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर अधिक सटीक आंकड़े जुटाए जाएंगे।

इस साल 12 लोगों की जान ले चुका है गुलदार

वन विभाग के अनुसार वर्ष 2026 में अब तक प्रदेश के विभिन्न पहाड़ी जिलों में गुलदार के हमलों में 12 लोगों की मौत हो चुकी है। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में 18, वर्ष 2024 में 15 और वर्ष 2023 में भी 18 लोगों की मौत गुलदार के हमलों में हुई थी। अल्मोड़ा जिले की बात करें तो पिछले तीन वर्षों में गुलदार के हमलों में तीन लोगों की मौत हुई है, जबकि 35 से अधिक लोग घायल हुए हैं। लगातार बढ़ रही ऐसी घटनाओं को देखते हुए वैज्ञानिक गणना को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

वैज्ञानिक तरीके से ऐसे होगी गुलदारों की गणना

वन विभाग आधुनिक तकनीकों की मदद से चरणबद्ध तरीके से सर्वे करेगा। इसमें कई वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को शामिल किया जाएगा।

सर्वेक्षण क्षेत्र का चयन

सबसे पहले गुलदार की मौजूदगी वाले वन क्षेत्रों का चयन किया जाएगा और पूरे क्षेत्र को अलग-अलग ग्रिड में विभाजित किया जाएगा।

फील्ड सर्वे

वनकर्मी जंगलों में जाकर पगमार्क, मल, खरोंच, मूत्र के निशान और शिकार के अवशेषों का रिकॉर्ड तैयार करेंगे।

कैमरा ट्रैप की मदद

गुलदारों की संभावित आवाजाही वाले रास्तों पर स्वचालित कैमरा ट्रैप लगाए जाएंगे, जिनसे उनकी तस्वीरें और गतिविधियां रिकॉर्ड होंगी।

फोटो पहचान प्रणाली

गुलदारों के शरीर पर बने विशेष धब्बों और आंखों के आसपास की आकृतियों के आधार पर प्रत्येक गुलदार की अलग पहचान की जाएगी।

डीएनए परीक्षण

जहां आवश्यकता होगी, वहां मल और बाल के नमूनों का डीएनए विश्लेषण कर पहचान की पुष्टि की जाएगी।

शिकार प्रजातियों का आकलन

हिरन, घुरड़, जंगली सूअर और अन्य वन्यजीवों की संख्या का भी सर्वे किया जाएगा, क्योंकि यही गुलदार का प्रमुख भोजन हैं।

आवास और पर्यावरण का अध्ययन

वनस्पति, जल स्रोत, मानव गतिविधियों और जंगल की गुणवत्ता का भी मूल्यांकन किया जाएगा ताकि गुलदारों के लिए उपयुक्त आवास की स्थिति समझी जा सके।

जीआईएस और रिमोट सेंसिंग तकनीक

उपग्रह चित्रों और जीआईएस तकनीक की सहायता से गुलदारों के आवास का विस्तृत डिजिटल मानचित्र तैयार किया जाएगा।

अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट

कैमरा ट्रैप, डीएनए विश्लेषण और फील्ड सर्वे से प्राप्त आंकड़ों का सांख्यिकीय विश्लेषण कर गुलदारों की कुल संख्या, घनत्व और वितरण पर अंतिम रिपोर्ट तैयार की जाएगी।

वैज्ञानिक गणना की पूरी प्रक्रिया

उप वन संरक्षक दीपक सिंह ने बताया कि गुलदारों की वैज्ञानिक गणना की पूरी प्रक्रिया तैयार की जा रही है। मुख्यालय से एसओपी जारी होने के बाद प्रदेशभर में निर्धारित मानकों के अनुसार सर्वेक्षण शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस पहल से गुलदारों के संरक्षण को मजबूती मिलेगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए भविष्य में प्रभावी रणनीति तैयार की जा सकेगी।