चमोली: रैणी-तपोवन में क्यों आई थी भयानक आपदा? वैज्ञानिक रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

Wadia Institute of Geology के वैज्ञानिकों ने एक शोध के माध्यम से Chamoli Rishiganga disaster की वजह बताने की कोशिश की है।
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Chamoli Rishiganga disaster: reasons for the disaster in Chamoli were revealed
Image: reasons for the disaster in Chamoli were revealed

चमोली: बीते फरवरी में चमोली के रैणी-तपोवन में ग्लेशियर टूटने के बाद कैसी तबाही मची, ये हम सबने देखा। यहां ऋषिगंगा में आए उफान से मची तबाही ने केदारनाथ आपदा के घाव ताजा कर दिए थे। आपदा का सैलाब गुजर चुका है। प्रभावित लोग अपनी जिंदगी ढर्रे पर लाने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन तबाही की वजह क्या थी, ये सवाल अब भी सबके मन में है। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक शोध के माध्यम से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है। वैज्ञानिकों ने कहा कि ऋषिगंगा घाटी में गत सात फरवरी को आई भीषण बाढ़ ग्लेशियर के ऊपरी क्षेत्र में जमा पानी और मलबे के कारण आई। यह मलबा वहां बीते 4-5 साल से जमा हो रहा था। मलबे और पानी के दबाव के कारण रोंगथी गदेरे में 540 मीटर चौड़ी व 720 मीटर लंबी चट्टान टूटने व उस पर टिके ग्लेशियर के खिसकने से बाढ़ आई। सर्दियों में आपदा क्यों आई, शोध में इसका भी खुलासा हुआ है। क्लाइमेट रिसर्च यूनिट टाइम सीरीज के 118 साल के डाटा के अनुसार, जनवरी-फरवरी में इस इलाके में तापमान शून्य डिग्री से नीचे रहता है। आपदा से पहले 4 और 5 फरवरी को यहां हिमपात हुआ था। आगे पढ़िए

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बर्फ के भार से जोड़ों-दरारों के खुलने और मलबे के भार को चट्टान सहन नहीं कर सकी और ग्लेशियर को साथ लेकर नीचे गिर पड़ी। रैणी-तपोवन में आई आपदा पर डॉ. मनीष मेहता, डॉ. विनीत कुमार, डॉ. समीर तिवारी, अमित कुमार और अक्षय वर्मा की टीम ने अध्ययन किया है। ये अध्ययन बताता है कि उत्तराखंड में हिमालय की अस्थिरता किस कदर बड़े खतरे पैदा कर सकती है। वाडिया भू-विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. कालाचांद साईं ने कहा कि भूगर्भीय हलचल से पहले ही हिमालय की चट्टानें कमजोर और नाजुक हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग से जो ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उससे चट्टानों की पकड़ कमजोर हो रही है। आपको बता दें कि गत 7 फरवरी को रैणी-तपोवन क्षेत्र में आई आपदा ने 32 किलोमीटर के दायरे में तबाही मचाई थी। आपदा में 77 शव और 35 मानव अंग बरामद हुए थे। 205 लोग लापता हो गए थे, जबकि 1500 करोड़ का नुकसान हुआ था। प्रभावित क्षेत्र में आज भी जगह-जगह तबाही के निशान साफ देखे जा सकते हैं।