Haridwar Land Scam: उत्तराखंड के भ्रष्ट प्रशासन की बानगी, जानिए कैसे अधिकारियों ने खेला 54 करोड़ का खेल

हरिद्वार नगर निगम की 54 करोड़ रुपये की विवादित भूमि खरीद मामले में विजिलेंस जांच के बाद बड़ा खुलासा हुआ है। पूर्व नगर आयुक्त पर बर्खास्तगी और पूर्व डीएम पर मेजर पेनाल्टी की सिफारिश की गई है।
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Haridwar Land Scam: Vigilance Probe Uncovers Alleged  54 Crore Land Scam in Haridwar
Image: Vigilance Probe Uncovers Alleged 54 Crore Land Scam in Haridwar

हरिद्वार: हरिद्वार नगर निगम की विवादित भूमि खरीद का मामला अब उत्तराखंड के सबसे बड़े प्रशासनिक विवादों में गिना जा रहा है। करीब 54 करोड़ रुपये में खरीदी गई भूमि को लेकर उठे सवालों ने कई वरिष्ठ अधिकारियों को जांच के दायरे में ला दिया है। विजिलेंस जांच में सामने आई अनियमितताओं के बाद सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है।

Vigilance Probe Uncovers Alleged ₹54 Crore Land Scam in Haridwar

जानकारी के अनुसार इस भूमि खरीद प्रकरण की नींव वर्ष 2022 में तत्कालीन जिलाधिकारी विनय शंकर पांडेय के कार्यकाल के दौरान रखी गई थी। इसी दौरान भूमि खरीद से जुड़ी प्रारंभिक प्रक्रियाएं और प्रशासनिक स्तर पर चर्चाएं शुरू हुई थीं, जिसके बाद आगे चलकर यह मामला करोड़ों रुपये के विवाद में बदल गया।

सितंबर 2024 में शुरू हुई भूमि खरीद प्रक्रिया

सितंबर 2024 में हरिद्वार नगर निगम ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (कूड़ा निस्तारण) परियोजना के लिए सराय गांव में लगभग 2.307 हेक्टेयर भूमि खरीदने की प्रक्रिया शुरू की। यह भूमि डंपिंग यार्ड के निकट स्थित थी और इसके भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया भी पूरी की गई। नगर निगम का उद्देश्य कूड़ा निस्तारण परियोजना के लिए स्थायी व्यवस्था विकसित करना था, लेकिन बाद में इसी भूमि के चयन और कीमत को लेकर विवाद शुरू हो गया।

कुछ ही महीनों में हुआ 54 करोड़ का सौदा

अक्टूबर और नवंबर 2024 के दौरान भूमि का मूल्यांकन किया गया और खरीद प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया गया। नगर निगम ने लगभग 54 करोड़ रुपये में इस भूमि की खरीद का सौदा पूरा कर लिया। हालांकि, बाद में आरोप लगे कि जिस जमीन को खरीदा गया उसकी वास्तविक बाजार कीमत काफी कम थी। इसके अलावा यह भी सवाल उठे कि जिस उद्देश्य के लिए भूमि खरीदी गई, उसके लिए वह पूरी तरह उपयुक्त नहीं थी।

शिकायतों के बाद उठने लगे सवाल

दिसंबर 2024 से अप्रैल 2025 के बीच भूमि खरीद प्रक्रिया, मूल्यांकन रिपोर्ट और प्रशासनिक मंजूरियों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आने लगीं। नगर निगम और राजस्व विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि भूमि का मूल्यांकन वास्तविक बाजार दर से कहीं अधिक किया गया और सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ। आगे पढ़िए..

प्रारंभिक जांच में मिले अनियमितता के संकेत

29 मई 2025 को शासन को प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी गई। इस रिपोर्ट में भूमि खरीद प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं और नियमों के उल्लंघन की बात सामने आई। रिपोर्ट ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया, जिसके बाद सरकार ने तत्काल कार्रवाई का फैसला लिया।
3 जून 2025 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मामले में बड़ा फैसला लेते हुए दो आईएएस अधिकारियों समेत कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया। साथ ही पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच विजिलेंस को सौंप दी गई। सरकार ने विवादित भूमि की रजिस्ट्री निरस्त करने और भुगतान की गई राशि की वसूली की प्रक्रिया शुरू करने के भी निर्देश दिए।

रजिस्ट्री रद्द कराने की शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया

5 जून 2025 को हरिद्वार नगर निगम ने विवादित भूमि की रजिस्ट्री निरस्त कराने के लिए अदालत जाने का निर्णय लिया। नए जिलाधिकारी की मौजूदगी में कानूनी राय ली गई और आगे की प्रक्रिया शुरू की गई। 11 जून 2025 को विजिलेंस टीम हरिद्वार पहुंची और विवादित भूमि का निरीक्षण किया। जांच अधिकारियों ने संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए तथा दस्तावेजों की पड़ताल शुरू की। इसके बाद जून 2025 से जून 2026 तक लगभग एक वर्ष तक विस्तृत जांच चली। इस दौरान बैंक रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग, मूल्यांकन रिपोर्ट, अनुमोदन प्रक्रिया और भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच की गई।

विजिलेंस रिपोर्ट के बाद हुई बड़ी कार्रवाई

19 जून 2026 को विजिलेंस रिपोर्ट सामने आने के बाद धामी सरकार ने कड़ा रुख अपनाया। रिपोर्ट में अनियमितताओं की पुष्टि होने पर तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी के खिलाफ सेवा से बर्खास्तगी की संस्तुति की गई। वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह के खिलाफ मेजर पेनाल्टी यानी गंभीर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई। इसके अलावा अन्य अधिकारियों के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई के आदेश जारी किए गए।

क्या हैं जांच में सामने आए मुख्य आरोप?

जांच एजेंसियों के अनुसार जिस भूमि को खरीदा गया वह डंपिंग यार्ड के निकट स्थित और परियोजना के लिए अनुपयुक्त थी। इसके बावजूद उसे लगभग 54 करोड़ रुपये की भारी कीमत पर खरीदा गया। इसके अलावा भूमि उपयोग परिवर्तन, मूल्यांकन प्रक्रिया और प्रशासनिक मंजूरियों में भी कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया से सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचा।

किस अधिकारी की क्या भूमिका रही?

वरुण चौधरी (तत्कालीन नगर आयुक्त) :- भूमि खरीद प्रक्रिया में नगर निगम की ओर से प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी के रूप में वरुण चौधरी की भूमिका रही। भूमि चयन, प्रस्तावों को आगे बढ़ाने और खरीद प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। इसी कारण उनके खिलाफ सेवा समाप्ति की संस्तुति की गई है।
कर्मेंद्र सिंह (तत्कालीन जिलाधिकारी) :- जिलाधिकारी के रूप में भूमि खरीद से जुड़े राजस्व और प्रशासनिक अनुमोदनों की निगरानी उनके अधिकार क्षेत्र में थी। जांच में उनकी भूमिका पर सवाल उठने के बाद उनके खिलाफ मेजर पेनाल्टी की सिफारिश की गई है।

ऐसे पूरी हुई भूमि खरीद की प्रक्रिया

जांच के अनुसार सबसे पहले भूमि खरीद का प्रस्ताव तैयार किया गया। इसके बाद राजस्व विभाग ने मूल्यांकन रिपोर्ट बनाई। फिर नगर निगम ने भूमि खरीद प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। इसके बाद फाइल नगर आयुक्त स्तर पर पहुंची और वहां से प्रशासनिक स्वीकृतियों के लिए जिलाधिकारी कार्यालय भेजी गई। अंत में भुगतान और रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी की गई।

अब आगे क्या होगा?

विजिलेंस रिपोर्ट सामने आने के बाद अब इस मामले में मुकदमा दर्ज होने की संभावना बढ़ गई है। सरकार पहले ही रजिस्ट्री निरस्त करने और भुगतान की वसूली की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। हरिद्वार भूमि खरीद प्रकरण अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं बल्कि उत्तराखंड में पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गया है।