Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल युद्ध में शहीद हुए उत्तराखंड के वीर सैनिकों के बेटे आज भारतीय सेना में देश की सेवा कर रहे हैं। जानिए वीर रावत, धीरेंद्र और मयंक थापा की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने अपने शहीद पिता की विरासत को आगे बढ़ाया।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Uttarakhand Families Continue the Tradition of Army Service
देहरादून: कारगिल युद्ध ने देश को कई अमर वीर दिए, लेकिन उनकी शहादत के साथ उनकी कहानी खत्म नहीं हुई। उत्तराखंड के कई शहीद सैनिकों के परिवारों में आज भी देशसेवा की वही लौ जल रही है। जिन बच्चों ने अपने पिता को खो दिया, उन्होंने बड़े होकर उसी भारतीय सेना की वर्दी को अपनाया, जिसे पहनकर उनके पिता मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। यह केवल पारिवारिक परंपरा नहीं, बल्कि शहादत से जन्मा वह संकल्प है, जिसने नई पीढ़ी को भी राष्ट्रसेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
Uttarakhand Families Continue the Tradition of Army Service
टिहरी गढ़वाल के डांडा बड़ीयारगढ़ गांव के राइफलमैन बिक्रम सिंह 29 जून 1999 को कारगिल युद्ध में देश के लिए शहीद हो गए थे। उस समय उनकी पत्नी बीरा देवी गर्भवती थीं। कुछ समय बाद जन्मे बेटे वीर रावत ने अपने पिता को कभी देखा नहीं, लेकिन बचपन से उनकी बहादुरी की कहानियां सुनते हुए बड़े हुए। मां की आंखों में पिता के लिए गर्व और गांववालों की जुबान पर उनकी वीरता ने वीर रावत के मन में भी सेना में जाने का सपना जगा दिया। आज वीर रावत भारतीय सेना की 9 गढ़वाल राइफल्स में तैनात हैं और अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
मां ने परिवार संभाला, बेटे ने संभाली देश की सीमा
कारगिल युद्ध में 30 मई 1999 को शहीद हुए लांस नायक हीरा सिंह का परिवार भी अदम्य साहस की मिसाल है। पति के बलिदान के बाद पत्नी गंगी देवी ने तीन बेटों का पालन-पोषण कठिन परिस्थितियों में किया। आगे पढ़िए..
उन्होंने अपने बच्चों के मन में देशभक्ति की भावना कभी कमजोर नहीं होने दी। सबसे छोटे बेटे धीरेंद्र ने पिता की राह पर चलने का फैसला किया। पढ़ाई छोड़कर सेना भर्ती की तैयारी की और आज वे कुमाऊं रेजीमेंट में देश की सेवा कर रहे हैं। परिवार की नई पीढ़ी भी सेना में जाने का सपना देख रही है। गंगी देवी का कहना है कि यदि उनके पोते भी वर्दी पहनेंगे तो यह उनके शहीद पति के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
पिता की वीरगाथा बनी बेटे की ताकत
देहरादून के सेलाकुई निवासी मयंक थापा की कहानी भी कारगिल की उसी अमर विरासत को आगे बढ़ाती है। उनके पिता नायक कृष्ण बहादुर थापा 11 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध के बटालिक सेक्टर में वीरगति को प्राप्त हुए थे। उस समय मयंक की उम्र केवल पांच वर्ष थी। पिता की यादें भले धुंधली थीं, लेकिन उनकी बहादुरी की कहानियां मयंक के जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गईं। बीबीए की पढ़ाई के दौरान उन्होंने सेना भर्ती परीक्षा दी और पहले ही प्रयास में चयनित होकर भारतीय सेना का हिस्सा बन गए। उनकी मां मीरा थापा कहती हैं कि बेटे ने अपने पिता के अधूरे सपने और जिम्मेदारी को अपना कर्तव्य बना लिया।
उत्तराखंड की पहचान है वीरों की धरती
उत्तराखंड लंबे समय से 'वीरभूमि' के नाम से जाना जाता है। यहां के हजारों सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं और अनेक परिवार ऐसे हैं, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी सेना में सेवा देना गर्व की परंपरा बन चुका है। कारगिल युद्ध के शहीदों के बेटों की ये कहानियां बताती हैं कि शहादत केवल एक परिवार का दुख नहीं होती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत बन जाती है।