पहाड़ के मोहनलाल जोशी...कभी 500 रुपये से शुरू की थी नौकरी, आज कई युवाओं को दे रहे हैं रोजगार

पहाड़ के मोहनलाल जोशी ने शेफ से लेकर होटल मालिक बनने तक का सफर तय किया है। उनकी मदद से पहाड़ के सैकड़ों युवा देश-विदेश में नौकरी हासिल कर चुके हैं।
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उत्तराखंड: mohanlal joshi providing employment
Image: mohanlal joshi providing employment

: कहते हैं जिंदगी एक साइकिल की तरह है। आप तब तक नीचे नहीं गिर सकते, जब तक आप पैडल मारना छोड़ ना दें। पहाड़ के एक युवा ने इस बात को ना सिर्फ समझा, बल्कि उसे अपनी जिंदगी में उतारा भी। 30 साल पहले ये युवा अपना गांव, अपना पहाड़ छोड़कर जापान गया और वहां की होटल इंडस्ट्री में अपने कदम जमाए। इस शख्स का नाम है मोहनलाल जोशी, जो कि टिहरी के रहने वाले हैं। अपनी मेहनत के दम पर मोहनलाल जोशी ने शेफ से लेकर होटल मालिक बनने तक का सफर तय किया है। आज वो देश-विदेश के कई होटलों के मालिक हैं, लेकिन इसके बावजूद अपनी जड़ों को नहीं भूले। होटल इंडस्ट्री में नई ऊंचाईयां हासिल करने के साथ ही वो उत्तराखंड के युवाओं को देश-विदेश में रोजगार दिलाने के लिए प्रयासरत हैं।टिहरी जिले के सौंला गांव के रहने वाले 56 साल के मोहनलाल जोशी का संघर्ष तीस साल पहले शुरू हुआ। घर की माली हालत खराब होने की वजह से वो केवल इंटर तक की पढ़ाई कर पाए, उसके बाद उन्होंने दिल्ली का रुख किया। दिल्ली में 500 रुपये तनख्वाह वाली नौकरी की, जिसमें से 3 सौ रुपये उन्हें कमरे का किराया देना पड़ता था।

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पैसे बचाने के लिए उन्हें भूखे पेट सोना पड़ा। कुछ साल बाद एक दोस्त की मदद से वो जापान गए। वहां उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर होटल मैनेजर बनने तक का सफर तय किया। होटल मालिक ने मदनलाल जोशी की मदद से पूरे जापान में 21 होटल खोले। सफलता हासिल करने की ठान चुके मोहनलाल जोशी ने कुछ साल बाद जापान में ही 'इंडो टाइगर' नाम से अपना होटल खोल दिया। इसी नाम से दो और होटल खोलने के बाद उन्होंने अमेरिका का रुख किया। अमेरिका के वर्जीनिया शहर में भी 'हॉर्बेश ऑफ इंडिया' नाम से होटल खोला। तीन दशक तक विदेश में नौकरी और कारोबार करने के बाद वो वापस उत्तराखंड आए औऱ देहरादून, ऋषिकेश और भानियावाला में 'इंडो टाइगर' नाम से होटल खोले हैं। मोहनलाल जोशी ने अपने होटल्स में उत्तराखंड के युवाओं को ना सिर्फ रोजगार दिया है, बल्कि वो सैकड़ों युवाओं को अपने खर्चे पर विदेशों में नौकरी करने के लिए भेज चुके हैं। पहाड़ की सेवा के लिए वो वापस लौट आए हैं, और अब यहीं रहकर युवाओं को रोजगार मुहैया कराने की कोशिश में जुटे हैं।