तीर्थ विधान परिषद की बैठक में बदरीनाथ, केदारनाथ और 85 अन्य मंदिरों की परंपराओं, हक-हकूक, राजपरिवार के अधिकार और स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा पर जोर दिया गया। परिषद ने 1924 के एक्ट के अनुरूप मंदिरों के संचालन की मांग की।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Teerth Vidhan Parishad Calls for Protection of Traditions of the Temples
देहरादून: उत्तराखंड में आयोजित तीर्थ विधान परिषद की बैठक में बदरीनाथ, केदारनाथ और उनसे जुड़े 85 मंदिरों की ऐतिहासिक पहचान, धार्मिक परंपराओं और हक-हकूक की रक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे गए। परिषद ने सरकार से 1924 के अधिनियम के अनुरूप तीर्थ व्यवस्था संचालित करने, राजपरिवार और स्थानीय हक-हकूक धारकों के अधिकार सुरक्षित रखने तथा विकास कार्यों में पारंपरिक मान्यताओं का पालन सुनिश्चित करने की मांग की।
Teerth Vidhan Parishad Calls for Protection of Traditions of the Temples
उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक धामों की परंपराओं, ऐतिहासिक अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने के उद्देश्य से आयोजित तीर्थ विधान परिषद की महत्वपूर्ण बैठक में कई अहम विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। ठाकुर भवानी प्रताप सिंह पंवार की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में श्री बदरीनाथ, श्री केदारनाथ सहित 85 अन्य मंदिरों की ऐतिहासिक पहचान, हक-हकूक और धार्मिक परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया।
1924 अधिनियम के अनुरूप हो तीर्थ व्यवस्था
थातराजगुरु आचार्य डॉ० कृष्णानन्द नौटियाल ने राज्य समीक्षा के साथ ख़ास बातचीत में बताया कि बैठक में बदरी-केदार मंदिरों का संचालन वर्ष 1924 के अधिनियम की मूल भावना के अनुरूप किये जाने के विषय पर जोर दिया गया। परिषद का मत था कि मंदिरों से जुड़े प्रशासनिक और विकास कार्यों में सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और स्थानीय व्यवस्थाओं का सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
विकास कार्यों के साथ परंपराओं का भी हो संरक्षण
बैठक में इस बात पर विशेष चिंता व्यक्त की गई कि आधुनिक विकास योजनाओं के दौरान मंदिरों की ऐतिहासिक पहचान और धार्मिक गरिमा प्रभावित नहीं होनी चाहिए। परिषद ने सुझाव दिया कि सभी विकास कार्य पारंपरिक धार्मिक मानकों और स्थानीय मान्यताओं को ध्यान में रखकर किए जाएं।
राजपरिवार, हक-हकूक धारकों के अधिकार हों सुरक्षित
तीर्थ विधान परिषद ने सरकार से मांग की कि गढ़वाल राजपरिवार तथा स्थानीय हक-हकूक धारकों के पारंपरिक अधिकारों और जिम्मेदारियों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। परिषद का कहना था कि सदियों से चली आ रही व्यवस्थाओं को संरक्षित रखना उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए आवश्यक है।
स्थानीय श्रद्धालुओं को मिले प्राथमिकता
आचार्य डॉ० नौटियाल ने बताया कि बैठक में यह भी प्रस्ताव रखा गया कि स्थानीय निवासियों को मंदिर दर्शन तथा धर्मशालाओं में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। परिषद का मानना है कि स्थानीय समाज सदियों से इन तीर्थों की सेवा और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रहा है।
हरिद्वार कुंभ और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों पर चर्चा
बैठक में गढ़वाल राजवंश की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थाओं, पंवार राजाओं द्वारा संपादित धार्मिक अनुष्ठानों तथा आगामी हरिद्वार कुंभ में सहभागिता को लेकर भी विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। साथ ही धार्मिक आयोजनों में परंपरागत व्यवस्थाओं को बनाए रखने पर बल दिया गया।
वन क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक मंदिरों, धरोहरों के संरक्षण को लेकर चिंता
गढ़वाल एवं कुमाऊं क्षेत्र में पंवार और चंद्र शासकों द्वारा निर्मित मंदिरों, महलों तथा ऐतिहासिक इमारतों के स्थापत्य, इतिहास और संरक्षण को लेकर चर्चा की गई। आचार्य डॉ० नौटियाल ने बताया कि परिषद ने इन धरोहरों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बहता कि बैठक में उन प्राचीन मंदिर समूहों का मुद्दा भी उठाया गया जो वर्तमान में वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आ चुके हैं। परिषद ने सुझाव दिया कि ऐसे मंदिरों की धार्मिक परंपराओं, पूजा-पद्धति और पारंपरिक अधिकार क्षेत्रों में किसी प्रकार का प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
बैठक में प्रवीण मंमगाई, प्रीतम पंवार, आनंद सिंह पंवार, नरेंद्र सिंह रौथाण, थातराजगुरु आचार्य डॉ० कृष्णानन्द नौटियाल, डॉ. मानवेंद्र सिंह बर्त्वाल, बिजेंद्र सिंह नेगी, संदीप खत्री, अशोक पंवार, राजीव पंवार, धीरेन्द्र सिंह बर्त्वाल सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने उत्तराखंड की धार्मिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।