हरिद्वार कुंभ: नागा सन्यासी बनीं 200 महिलाएं..जानिए कितना मुश्किल होता है इनका जीवन

गुरुवार को सैकड़ों महिला नागा संन्यासी मोह-माया के बंधन तोड़ अवधूतानी के रूप में दीक्षित हो गईं। अब सभी अवधूतानी शाही स्नान में वरिष्ठ संतों संग हिस्सा ले सकेंगी।
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Mahila Naga Sadhu: 200 women become Naga Sannyasis in Haridwar Kumbh
Image: 200 women become Naga Sannyasis in Haridwar Kumbh

हरिद्वार: हरिद्वार महाकुंभ। दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक मेला। गुरुवार को यहां 200 महिला नागा संन्यासियों को दीक्षा दी गई। श्रीपंच दशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि से मिले प्रेयस मंत्र और गेरुआ वस्त्र को धारण करने के साथ ही सैकड़ों महिला नागा संन्यासी मोह-माया के बंधन तोड़ अवधूतानी के रूप में दीक्षित हो गईं। अब सभी अवधूतानी 12 अप्रैल और उसके बाद होने वाले शाही स्नान में वरिष्ठ संतों संग हिस्सा ले सकेंगी। नागा साधुओं के अखाड़ों में महिला संन्यासियों की एक खास पहचान होती है। महिला साधु पुरुष नागाओं की तरह नग्न रहने के बजाए एक गेरूआ वस्त्र लपेटकर जीवन यापन करती हैं। हरिद्वार में दो दिवसीय दीक्षा कार्यक्रम के आखिरी दिन गुरुवार को सभी संन्यासिनों को ब्रह्ममुहूर्त में प्रेयस मंत्र प्रदान किया गया। इससे पहले बुधवार को गंगा घाट पर शिखा सूत्र त्याग करने के साथ ही मुंडन संस्कार समेत अन्य संस्कार पूरे किए गए थे। नागा संन्यासी के तौर पर दीक्षित होने वाली अवधूतानी को अपना पुराना नाम, स्थान और परिचय का त्याग करना पड़ता है। दीक्षा के बाद उन्हें नया नाम दिया जाता है, साथ ही माई या माता कहकर संबोधित किया जाता है। आगे पढ़िए

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गुरुवार को दीक्षित होने वालों में बीजेपी नेत्री सरोज शर्मा भी शामिल हैं। उन्हें दीक्षा के बाद माई कैलाश गिरि कहकर पुकारा जाएगा। माई कैलाश गिरि ने बताया कि वो बीजेपी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ की जिलाध्यक्ष रह चुकी हैं। उन्होंने राजनीति विज्ञान, इतिहास और हिंदी साहित्य विषय में ग्रेजुएशन किया है। हिंदी और अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान रखने वाली माई कैलाश गिरि ने हरिद्वार कुंभ में पूर्ण रूप से संन्यास ग्रहण कर लिया। इसी तरह अवधूतानी के रूप में दीक्षा लेने वाली गुजरात की योगिनी श्रीमहंत माता शैलजा गिरि पोस्ट ग्रेजुएट होने के साथ सहज योग की प्रकांड विद्वान हैं। अंग्रेजी और हिंदी में प्रवचन करने वाली माता शैलजा गिरि बताती हैं कि धर्म में उनकी बचपन से ही गहरी आस्था थी। सहज योग अपनाने के बाद उन्हें धर्म-आध्यात्म की समझ होने लगी। जिसके बाद उन्होंने संन्यास धारण कर लिया। माता शैलजा ने गुजरात के गिर क्षेत्र में अपना आश्रम भी स्थापित किया है। जहां वो सहज योग की दीक्षा देती हैं।