वक्त के साथ हम सभी इसे लगभग भूलते जा रहे हैं लेकिन उत्तराखंड के जौनपुर में कई गांवों में आज भी ये त्योहार बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। देखिए वीडियो...
-
राज्य समीक्षा डेस्क
-
Advertisement
Hidden Gem Treks of Kedar Himalaya You Must Explore Once in Life
Peaceful and untouched trekking routes away from the crowds. Hidden trails where nature still remains raw and pure.
Example Ads Media
Image: Know about Dubdi Mahotsav of Jaunpur with Sona Sajwan
टिहरी गढ़वाल: उत्तराखंड देवों की भूमि होने के साथ ही देवों से सम्बंधित त्योहारों की भी भूमि है। उत्तराखंड में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के साथ में दुबड़ी पर्व को भी बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। हालांकि वक्त के साथ हम सभी इसे लगभग भूलते जा रहे हैं लेकिन उत्तराखंड के जौनपुर में कई गांवों में आज भी ये त्योहार बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। टिहरी गढ़वाल जिले का जौनपुर इलाका अपनी अनूठी परंपराओं और त्योहारों के लिए जाना जाता है। ऐसा ही एक "दुबड़ी त्यौहार" है, जिसकी परंपराओं और रीतियों पर अगर गौर करें तो इसे पहाड़ का रक्षाबंधन कहा जा सकता है। बता दें की श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के बाद दुर्गा अष्टमी को जौनपुर ब्लॉक के गांवों में दुबड़ी का पर्व मनाया जाता है, और दुबड़ी पर्व के साथ ही यहां पर त्योहारों का शुभारंभ भी हो जाता है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जौनपुर क्षेत्र में भादों के महीने मनाया जाने वाले दुबड़ी पर्व को त्योहारों की शुरुआत माना जाता है। जौनपुर विकासखंड के सेन्दुल, मौगी, खैराड़, मसरास, टकारना, कुदाऊं, मुंगलोड़ी, डिगोन सहित दर्जनों गांवों में दुबड़ी का त्योहार इस बार भी मनाया गया। कहते हैं की इस पर्व को वासुदेव के घर पैदा हुई कन्या को दुर्गा मां के रूप में पूजा जाता है... आगे इस त्यौहार की कुछ और भी खास बातें जानिये..
यह भी पढ़ें - गढ़वाल में ऐसी जिला पंचायत अध्यक्ष भी हैं, 4 Km खड़ी चढ़ाई तक पहुंचाया पानी..बनाया कीर्तिमान
टिहरी गढ़वाल जिले के जौनपुर इलाके में मनाया जाने वाला दुबड़ी त्योहार अपने आप में बेहद अनूठा पर्व है। इस पर्व को लेकर कई मान्यताएं हैं, इन्हीं में से एक मान्यता ये भी है कि इस दिन गांव की सभी बहनें अपने मायके आती हैं और दुबड़ी के दिन वो अपने भाई की खुशहाली के लिए पूजा करती हैं। हालांकि इसे मनाने का तरीका थोड़ा अलग होता है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में जिस गांव में बालिका का जन्म होता है, उस गांव में ये त्योहार मनाया जाता है और इस वजह से दुबड़ी को पहाड़ का रक्षाबंधन भी कहा जाता है। वहीं कुछ लोगों का मानना है की जन्माष्टमी के दिन किसी गांव में कन्या का जन्म होता है तो गांव में शुद्धि स्वरूप इस त्योहार को मनाया जाता है। कुछ लोग ये भी मानते हैं कि अगर इस दिन किसी कन्या की मृत्यु होती है, तो वहां दुबड़ी पर्व तब तक नहीं मनाया जाता, जब तक उस गांव में जनमाष्ट्मी या दुबड़ी के दिन कन्या का जन्म न हो जाए। आगे विडियो भी देखिये...
यह भी पढ़ें - गढ़वाल में ऐसी जिला पंचायत अध्यक्ष भी हैं, 4 Km खड़ी चढ़ाई तक पहुंचाया पानी..बनाया कीर्तिमान
इस बार भी जौनपुर ब्लॉक क्षेत्र के गांवों में दुबड़ी पर्व की धूम मची रही। जौनपुर के सेन्दुल गांव में दुबड़ी (दुर्गा अष्टमी) का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। इस बार सेन्दुल गांव में ग्रामीणों ने पारंपरिक वाद्ययंत्रों और ढोल-दमाऊं की थाप पर नृत्य कर भूमि और कुलदेवता से क्षेत्र के सुख-समृद्धि का आशीर्वाद लिया। इस अवसर पर टिहरी गढ़वाल की जिला पंचायत अध्यक्ष सोना सजवाण ने राज्य समीक्षा को खास बातचीत में बताया कि सेन्दुल गांव में ग्रामीणों ने मंडुवा, चौलाई, झंगोरा की नई फसल का भोग लगाया। जिला पंचायत अध्यक्ष सोना सजवाण ने लोगों के साथ मिलकर नए अनाज से रोटियाँ बनायीं जिसे प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। यहां आपको बता दें कि सोना सजवाण टिहरी जिले में 100 से भी अधिक पानी के पुराने बंद पड़े श्रोतों (पंदेरों) को पुनर्जीवित करने का काम कर रही हैं, और इसीलिए वो टिहरी गढ़वाल जिले के सभी गांवों में अक्सर भ्रमण करती रहती हैं।
राज्य समीक्षा की ओर से भी सभी पाठकों को जन्माष्ठमी और दुबडी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। सेन्दुल गांव में दुबडी महोत्सव का ये विडियो देखिये...