उत्तराखंड के लिए ‘भूमि बंदोबस्त’ है जरूरी, भू-कानून पर भगत सिंह कोश्यारी का भी आया बयान

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से अनुरोध किया कि उत्तराखंड के मूलनिवासियों को भूमि बंदोबस्ती की अत्यंत आवश्यकता है।
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Bhu Kanoon: Bhagat Singh Kosyari statement on Bhu Kanoon
Image: Bhagat Singh Kosyari statement on Bhu Kanoon

देहरादून: कोश्यारी जी ने कहा कि आज पहाड़वासियों को यह पता नहीं है कि उनकी भूमि के विभिन्न हिस्से कहां-कहां हैं। एक खेत का नंबर एक जगह पर है जबकि दूसरे का नंबर कहीं और दर्ज है। इस स्थिति में पहाड़ के लोगों को अपनी जमीन के बारे में संदेह, भ्रम और समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

Bhagat Singh Kosyari statement on Bhu Kanoon

भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि राज्य सरकार को पहाड़ों पर भूमि बंदोबस्ती का कार्य शीघ्र शुरू करना चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से अनुरोध किया कि उत्तराखंड के मूलनिवासियों को भूमि बंदोबस्ती की अत्यंत आवश्यकता है। यह कार्य कठिन जरूर है लेकिन आधुनिक तकनीक की सहायता से इसे समय पर पूरा किया जा सकता है। श्री कोश्यारी ने जब मुख्यमंत्री का पद संभाला था, तब भी वे भूमि बंदोबस्ती की बात करते रहे थे। उस समय राज्य नया-नया बना था और उनके अल्पकालिक कार्यकाल के बाद कांग्रेस की सरकार आई जिसके मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड बनने के बाद से अब तक भूमि बंदोबस्ती नहीं की गई है।

भूमि बंदोबस्त की आवश्यकता और समस्याएँ

आजाद भारत में पहाड़ी जिलों में भूमि बंदोबस्ती केवल 1960 और 1964 के बीच की गई थी तब ये जिले उत्तरप्रदेश के अधीन हुआ करते थे। उत्तराखंड में भू कानून और मूल निवासियों के अधिकारों को लेकर लंबे समय से आंदोलन होते रहे हैं। श्री कोश्यारी ने इस पर जोर देते हुए कहा कि पहले यह जानना आवश्यक है कि मूल निवासियों की भूमि कितनी और कहां-कहां फैली हुई है ताकि एक भूमि बैंक तैयार किया जा सके। राज्य के निर्माण के बाद से हर सरकार ने भूमि बंदोबस्ती की आवश्यकता महसूस की है, लेकिन इस पर कार्रवाई नहीं हो पाई। अधिकांश जमीन गोल खातों में कैद है और जब स्थानीय निवासी या किसान अपनी भूमि की नापजोख करवाना चाहते हैं, तो राजस्व कर्मी उनका आर्थिक शोषण करते हैं और प्रक्रिया में महीनों लग जाते हैं।

भूमि बंदोबस्त में लग सकते हैं तीन साल

प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में जंगलों की उपस्थिति के कारण योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए भूमि की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है। इस स्थिति में भूमि की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए भूमि बंदोबस्ती करना पहली आवश्यकता है। यह एक जटिल और समय लेने वाला कार्य है, जिसके कारण सरकार इस पर काम करने से हिचकिचाती रही है। जानकारी के अनुसार भूमि बंदोबस्ती के इस कार्य को पूरा करने के लिए कम से कम तीन साल का समय चाहिए। यदि यह प्रक्रिया शुरू होती है तो मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले ऊपरी जिलों के स्थानीय निवासी अपनी भूमि की बंदोबस्ती के लिए पहाड़ वापस लौट सकते हैं।