नैनीताल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अल्मोड़ा जिला अदालत के आदेश को निरस्त किया और दीपक सिंह बिष्ट को आरोपों से मुक्त करते हुए सजा से बरी कर दिया।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: The High Court overturned the district court decision
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अल्मोड़ा जिले की जिला सत्र अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सज़ा को रद्द किया है। साल 2018 में जिला सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त दीपक सिंह बिष्ट को हत्या के आरोप में आजीवन कारावास और जुर्माने से दंडित किया था। लेकिन अब हाईकोर्ट ने दीपक सिंह बिष्ट को बरी कर दिया है।
The High Court overturned the district court's decision
जानकारी के अनुसार यह मामला अल्मोड़ा के गुणादित्य हॉर्टिकल्चर विभाग से जुड़ा है। मृतक पनी राम वहां ग्राम विकास अधिकारी के पद पर तैनात थे। घटना वाली रात पनी राम विभागीय भवन में दीपक सिंह बिष्ट के साथ दावत पर थे। लेकिन अगले दिन पनी राम की लाश विभाग के भवन के निचले बरामदे में खून से लथपथ मिली। उनके सिर पर गंभीर चोट के निशान थे। सीढ़ियों पर भी खून के धब्बे पाए गए, जिन्हें साफ करने की कोशिश की गई थी, लेकिन पूरी तरह से मिटाए नहीं जा सके। पुलिस ने संदेह के आधार पर दीपक सिंह बिष्ट को गिरफ्तार कर चार्जशीट दायर की। जिसके बाद जिला अदालत ने गवाहों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उसे दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
जिला अदालत ने दी थी आजीवन कारावास की सजा
2018 में अल्मोड़ा के जिला सत्र न्यायाधीश ने दीपक सिंह बिष्ट को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और धारा 201 (साक्ष्य मिटाने) के तहत दोषी ठहराया था। जिसमें कोर्ट ने दीपक सिंह बिष्ट को आजीवन कारावास के साथ धारा 302 के तहत 40,000 रुपये, धारा 201 के तहत 5,000 रुपये का जुर्माने सजा सुनाई थी। वहीं जुर्माना न चुकाने की स्थिति में 302 के तहत 7 साल और 201 के तहत 6 माह का अतिरिक्त कारावास की सजा का फैसला सुनाया था।
उच्च न्यायालय ने किया बरी
जिला के इस आदेश पर दीपक सिंह बिष्ट ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। जिसपर सुनवाई करते हुए नैनीताल हाईकोर्ट की खंडपीठ न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा ने पाया कि जिला कोर्ट में अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा। अभियोजन पक्ष ठोस और निर्णायक सबूत पर गवाह पेश नहीं कर पाया। इसी कारण खंडपीठ ने जिला अदालत का आदेश निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने दीपक सिंह बिष्ट को आरोपों से मुक्त करते हुए सजा से बरी कर दिया।