मोबाइल और डिजिटल उपकरणों का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों में स्क्रीन एडिक्शन, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या और एकाग्रता की कमी जैसी परेशानियां बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों ने स्क्रीन टाइम सीमित रखने की सलाह दी है।
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Image: Mental health problems are rising due to screen addiction
देहरादून: मोबाइल, टैबलेट और अन्य डिजिटल उपकरणों का बढ़ता उपयोग अब बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। पढ़ाई, मनोरंजन और सोशल मीडिया के नाम पर बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों की दिनचर्या, व्यवहार और मानसिक स्थिति को प्रभावित कर रहा है। दून अस्पताल, जिला चिकित्सालय और निजी अस्पतालों में स्क्रीन एडिक्शन, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या, एकाग्रता की कमी, अवसाद और सामाजिक दूरी जैसी शिकायतों के साथ आने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
Mental health problems are rising due to screen addiction
विशेषज्ञों के अनुसार पहले प्रतिदिन लगभग 10 बच्चे ऐसी समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंचते थे, जबकि अब यह संख्या बढ़कर करीब 15 तक पहुंच गई है। डॉक्टरों का कहना है कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना चाहिए। वहीं 2 से 5 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम एक घंटे तक सीमित रखना बेहतर है। छह वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों में भी स्क्रीन का उपयोग इतना ही होना चाहिए कि उनकी नींद, पढ़ाई, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियां प्रभावित न हों।
स्क्रीन टाइम से बढ़ रहीं व्यवहार संबंधी समस्याएं
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. जया नवानी के अनुसार, लंबे समय तक मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल बच्चों की नींद, व्यवहार और भावनात्मक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल रहा है। उन्होंने बताया कि ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और सामाजिक गतिविधियों से दूरी जैसी समस्याएं तेजी से देखने को मिल रही हैं। उन्होंने अभिभावकों को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखने और उसकी सीमा तय करने की सलाह दी। आगे पढ़िए..
जिला चिकित्सालय की मनोचिकित्सक डॉ. निशा सिंगला का कहना है कि स्क्रीन एडिक्शन का समाधान सिर्फ मोबाइल छीन लेना नहीं है। उनके अनुसार, बच्चों के व्यवहार को समझना, उनकी दिनचर्या में सकारात्मक बदलाव लाना और परिवार के साथ उनका समय बढ़ाना जरूरी है। कई बच्चे अकेलेपन, तनाव या भावनात्मक कारणों से भी मोबाइल और स्क्रीन की ओर अधिक आकर्षित होते हैं।
अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
श्रीमहंत इंदिरेश अस्पताल के मनोरोग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. शोभित गर्ग का कहना है कि आज मोबाइल बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में इसे पूरी तरह बंद करने के बजाय इसके उपयोग की स्पष्ट समय सीमा तय करना अधिक व्यावहारिक उपाय है। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों के साथ संवाद बढ़ाने, खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियों और सामाजिक मेलजोल के लिए प्रेरित करने की अपील की।
ये संकेत दिखें तो रहें सतर्क
मोबाइल हटाने पर अत्यधिक गुस्सा या बेचैनी
पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में रुचि कम होना
नींद का बिगड़ना
परिवार और दोस्तों से दूरी बनाना
अकेले रहना पसंद करना
ध्यान केंद्रित करने में परेशानी
बच्चों को स्क्रीन एडिक्शन से ऐसे बचाएं
बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय करें।
सोने से पहले मोबाइल या टैबलेट का इस्तेमाल न करने दें।
परिवार के साथ बातचीत और गुणवत्तापूर्ण समय बढ़ाएं।
बच्चों को खेलकूद, पढ़ने और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें।
यदि समस्या गंभीर लगे तो मनोचिकित्सक या विशेषज्ञ से सलाह लें।