देवभूमि उत्तराखंड धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत से भरपूर है। यहाँ प्राचीन मंदिर और तीर्थ स्थल हैं जो हिंदू पौराणिक कथाओं के देवी-देवताओं से जुड़े हैं। जिनको देखने के लिए लोग विश्वभर से यहाँ आते हैं।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Maa Parvati Did Penance For 60000 Years in Bhuvaneshwari Devi Temple
ऋषिकेश: गौरी शंकर महादेव मंदिर जो ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर स्थित है, अपने विविध और रोचक इतिहास के लिए जाना जाता है। मंदिर के पुजारी जगदीश प्रपन्नाचार्य बताते हैं कि यहाँ पर माता पार्वती ने करीब 60,000 वर्ष तपस्या की थी।
Maa Parvati Did Penance For 60,000 Years in Bhuvaneshwari Devi Temple
उत्तराखंड में स्थित ऋषिकेश हिंदुओं के आस्था के प्रमुख केंद्रों में से एक है, जहां प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु देवी-देवताओं के दर्शन के लिए आते हैं। यहां के हर मंदिर की अपनी खासियत और ऐतिहासिक महत्व है। यहां कई प्राचीन मंदिर हैं जिनमें से नीलकंठ महादेव मंदिर (Neelkanth Mahadev Temple) विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहां दर्शन के लिए हमेशा भक्तों की भीड़ लगी रहती है विशेषकर सावन माह में। जबकि इस मंदिर का इतिहास अधिकांश लोग जानते हैं इसके पास स्थित भुवनेश्वरी देवी का मंदिर कम ही लोगों के लिए परिचित है। इस मंदिर का भी एक दिलचस्प इतिहास है जिसे आज हम आपके साथ साझा करेंगे।
मां भुवनेश्वरी देवी मंदिर का इतिहास
योगनगरी ऋषिकेश से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर नीलकंठ महादेव मंदिर के पास स्थित मां भुवनेश्वरी देवी मंदिर भी एक महत्वपूर्ण स्थल है। यह मंदिर माता पार्वती को समर्पित है। मंदिर के पुजारी जगदीश प्रपन्नाचार्य के अनुसार मां भुवनेश्वरी देवी मंदिर का इतिहास नीलकंठ महादेव से जुड़ा हुआ है। जबकि नीलकंठ महादेव का इतिहास अधिकांश लोगों को ज्ञात है लेकिन मां भुवनेश्वरी देवी मंदिर के बारे में कम ही लोग जानते हैं। यहां माता पार्वती ने करीब 60,000 वर्षों तक तपस्या की थी जिसके बाद इस स्थान पर माता पार्वती का मंदिर बनवाया गया और इसे मां भुवनेश्वरी देवी का नाम दिया गया।
समुद्र मंथन का विष पीने के बाद शिवजी ने यहाँ ध्यान लगाया
पुजारी जगदीश प्रपन्नाचार्य ने आगे बताया कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव ने हलाहल विष पी लिया था और एक ऐसे स्थान की तलाश में थे जहां उन्हें शीतलता मिले। ढूंढ़ते हुए वे मणिकूट पर्वत पर पहुंचे और वहां उन्हें वह ठंडक मिली जिसकी खोज में थे। महादेव ने यहां करीब 60,000 वर्षों तक ध्यान लगाया इसीलिए इसे श्री नीलकंठ महादेव मंदिर के रूप में जाना जाता है। जब माता पार्वती को इस बारे में पता चला तो वह भी मणिकूट पर्वत पर आईं और भगवान शिव के साथ तपस्या करने लगीं। 60 हजार वर्षों के बाद जब भगवान शिव की तपस्या समाप्त हुई तो माता पार्वती ने भी अपनी तपस्या पूरी की और भगवान शिव के साथ कैलाश लौट गईं। इसी स्थान पर माता पार्वती की तपस्या के स्मारक के रूप में यह मंदिर बनाया गया। देवभूमि के इस रहस्यमयी मंदिर के बारे में जानने के बाद आप भी माता के इस मंदिर में दर्शन करने अवश्य जाएं।