प्रोफेसर दीपक बताते हैं कि प्रसिद्ध पुस्तक ‘Butterflies of Uttarakhand’ के अनुसार 1949 के बाद इस तितली के दिखने का कोई पुष्ट दस्तावेज नहीं है। अब 2025 में इसका दोबारा दिखना प्रदेश की जैव विविधता के इतिहास में मील का पत्थर है।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Rare butterfly Ratna Flat found in Uttarakhand after 76 years
चमोली: उत्तराखंड के ग्वालदम की घाटियों में 76 साल बाद ‘रत्ना फ्लैट’ तितली का प्रमाण मिला है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में इस तितली का अंतिम रिकॉर्ड साल 1949 में है। इस तरह, 2025 में इसका दोबारा दिखना प्रदेश की जैव विविधता के इतिहास में एक मील का पत्थर है।
Rare butterfly 'Ratna Flat' found in Uttarakhand after 76 years
डिग्री कॉलेज कपकोट के सहायक प्रोफेसर दीपक कुमार ने यह खोज की है। वे काफी समय से ग्वालदम के जंगलों में तितलियों और पक्षियों का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। दीपक बताते हैं 9 अगस्त 2025 की सुबह वे चमोली जिले के ग्वालदम कस्बे में लगभग 1960 मीटर की ऊंचाई पर एक जलधारा के पास खड़े थे, तभी उनकी नजर एक बेहद छोटी और विशिष्ट तितली पर पड़ी। ये तितली नींबू बाम (Melissa officinalis) की पत्ती पर स्थिर थी। उसके पंखों पर उभरता रंग-बिरंगा पैटर्न बिल्कुल अनोखा था। उन्होंने तुरंत तस्वीर ली और बाद में शोध व रिकॉर्ड के मिलान से यह पुष्टि हुई कि यह वही दुर्लभ तितली (रत्ना फ्लैट ) है, जिसे दशक़ों से नहीं देखा गया था।
रत्ना फ्लैट हेस्पीरियडे परिवार की तितली
यह दुर्लभ रत्ना फ्लैट हेस्पीरियडे परिवार की तितली है, इसका वैज्ञानिक नाम Selenorrhinus ratna daphne है। यह तितली जून से सितंबर के बीच 1500–2600 मीटर की ऊंचाई वाले हिमालयी वनों में सक्रिय रहती है। यह तितली मानव आबादी के नजदीक लगभग ना के बराबर दिखती है। उत्तराखंड में इस तितली का अंतिम रिकॉर्ड साल 1949 में मिलता है। रत्ना फ्लैट की पहचान सुनिश्चित करने के बाद दीपक ने इसका वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार किया, जिसे अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Journal of Entomology and Zoology Studies ने प्रकाशित किया है। इसके साथ ही यह आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया कि उत्तराखंड में 76 साल बाद इस प्रजाति की वापसी हुई है।
जैव विविधता के इतिहास में मील का पत्थर
प्रोफेसर दीपक बताते हैं कि प्रसिद्ध पुस्तक ‘Butterflies of Uttarakhand’ (लेखक संजय सोढ़ी व कृष्णामेघ कुंटे) के अनुसार 1949 के बाद इस तितली के दिखने का कोई पुष्ट दस्तावेज नहीं मिला था। इस तरह, 2025 में इसका दोबारा दिखना सिर्फ एक खोज नहीं, बल्कि प्रदेश की जैव विविधता के इतिहास में एक मील का पत्थर है। यदि इसी तरह के अध्ययन नियमित रूप से होते रहें, तो प्रदेश में कई और दुर्लभ तितलियों की प्रजातियां सामने आ सकती हैं।