गढ़वाल विश्वविद्यालय में कुलपति नियुक्ति पर बवाल, हाईकोर्ट ने UGC से किया जवाब तलब

गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सुनवाई की। कोर्ट ने UGC से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 11 मार्च 2026 तय की है।
Advertisement No reels. No crowds. Just Kedar Himalaya - This trek doesn’t want to be famous..

Alpine meadows, dense forests, and snow-capped peaks in one journey. Suitable for both beginner and experienced trekkers.

Example Ads Media
HNBGU VC Appointment Case: High Court Seeks UGC Clarification on Garhwal University VC Appointment
Image: High Court Seeks UGC Clarification on Garhwal University VC Appointment

श्रीनगर गढ़वाल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर के कुलपति की नियुक्ति को निरस्त (क्वैश) करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई की। मामले की सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 11 मार्च 2026 की तिथि तय की है।

High Court Seeks UGC Clarification on Garhwal University VC Appointment

मामले के अनुसार, प्रोफेसर नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 और UGC विनियम, 2018 के प्रावधानों का उल्लंघन कर की गई है। याचिका में कहा गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया में निर्धारित पात्रता शर्तों का पालन नहीं किया गया।

UGC विनियमों के उल्लंघन का आरोप

याचिका में कहा गया है कि कुलपति के रूप में प्रोफेसर प्रकाश सिंह की निरंतर नियुक्ति UGC विनियमों और विज्ञापन में निर्धारित पात्रता शर्तों के विपरीत है। यह नियुक्ति न केवल मनमानी और अवैध है, बल्कि मेरिट आधारित नियुक्ति व्यवस्था की पवित्रता को भी नुकसान पहुंचाती है।

अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन की दलील

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि यह नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का उल्लंघन करती है। इस कारण याचिकाकर्ता को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

10 वर्षों के प्रोफेसर अनुभव की अनिवार्यता

याचिका में स्पष्ट किया गया है कि UGC विनियम, 2018 के विनियम 7.3 के अनुसार कुलपति पद के लिए विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में न्यूनतम 10 वर्षों का अनुभव अनिवार्य है। आरोप है कि प्रोफेसर प्रकाश सिंह इस अनिवार्य शर्त को पूरा नहीं करते।

IIPA के अनुभव को मानने से इनकार

याचिका में यह भी कहा गया है कि भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) में चेयर प्रोफेसर के रूप में किया गया कार्य विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के समकक्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि IIPA न तो विश्वविद्यालय है और न ही वह UGC मानकों के अधीन संचालित संस्था है।

विज्ञापन की शर्तों में कोई छूट संभव नहीं

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन में पात्रता को स्पष्ट रूप से “विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में 10 वर्ष का अनुभव” तक सीमित किया गया था। इसमें किसी भी प्रकार की समकक्षता या विकल्प की कोई गुंजाइश नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया है कि चयन समिति चयन प्रक्रिया के दौरान या बाद में पात्रता शर्तों में बदलाव या शिथिलता नहीं कर सकती। ऐसा करना कानूनन गलत और असंवैधानिक है।