उत्तराखंड: बनभूलपुरा अतिक्रमण मामले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुनर्वास पर बड़ा निर्देश

हल्द्वानी के बनभूलपुरा अतिक्रमण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुनर्वास अधिकार नहीं बल्कि रियायत है। रेलवे विस्तार परियोजना के बीच कोर्ट ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कैंप लगाने के निर्देश दिए।
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Banbhoolpura Encroachment Case: Supreme Court Hearing on Haldwani-Banbhoolpura Encroachment Case
Image: Supreme Court Hearing on Haldwani-Banbhoolpura Encroachment Case

हल्द्वानी: हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रेलवे भूमि पर कथित अतिक्रमण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुनर्वास उसी स्थान पर मांगना अधिकार नहीं है। कोर्ट ने राज्य लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पात्र परिवारों की मदद के लिए कैंप लगाने का निर्देश दिया।

Supreme Court Hearing on Haldwani Banbhoolpura Encroachment Case

दरअसल यह मामला उत्तराखंड के नैनीताल जिला मुख्यालय हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र से जुड़ा है, जहां रेलवे की भूमि पर कथित तौर पर हजारों लोगों के कब्जे का मुद्दा उठाया गया। दिसंबर 2022 में Uttarakhand High Court ने करीब 50,000 लोगों को बेदखल करने का आदेश दिया था। जनवरी 2023 में Supreme Court of India ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। अब इस मामले पर 24 फरवरी को सुनवाई हुई।

किन जजों की बेंच ने की सुनवाई?

इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की बेंच के समक्ष हुई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि रेलवे एक्सपेंशन प्रोजेक्ट के चलते बेदखली का सामना कर रहे लोग उसी जमीन पर पुनर्वास की मांग नहीं कर सकते। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि संबंधित जमीन सार्वजनिक संपत्ति (Public Property) है।

रेलवे की जमीन पर 27,000 लोगों ने कब्जा

जस्टिस बागची ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को दी जाने वाली कोई भी राहत “अधिकार” के बजाय “रियायत” (Concession) होगी। यह अधिकतम एक विशेष सुविधा हो सकती है, न कि कानूनी हक। सुनवाई के दौरान बताया गया कि सरकार के अनुसार 5236 परिवार प्रभावित हैं। करीब 27,000 लोगों ने रेलवे की जमीन पर कब्जा कर रखा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दावा किया गया कि संख्या 50,000 तक है।

कब्जा गैर-कानूनी है

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने दलील दी कि बड़ी संख्या में लोग प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए पात्र नहीं होंगे। इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि यह सरकारी जमीन है और ऐसी दलील मानो जमीन पर रहने का अधिकार होने का दावा कर रही हो। कोर्ट ने कहा कि कब्जा गैर-कानूनी है और राज्य को यह तय करने का अधिकार है कि जमीन का उपयोग कैसे होगा।

रेलवे प्रोजेक्ट पर कोर्ट की टिप्पणी

रेलवे की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी मौजूद रहीं। कोर्ट ने पूछा कि क्या राज्य पुनर्वास के लिए अलग जमीन अधिग्रहित कर सकता है। CJI ने कहा कि हजारों परिवारों के पुनर्वास में केवल मकान नहीं, बल्कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, पानी की आपूर्ति, सीवेज व्यवस्था और स्कूल और बुनियादी सुविधाएं भी सुनिश्चित करनी होंगी। उन्होंने कहा कि यह समस्या नहीं बल्कि एक चुनौती है, जिसके लिए संवेदनशील और व्यावहारिक समाधान चाहिए।

PM आवास योजना के तहत कैंप का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने Uttarakhand State Legal Services Authority को निर्देश दिया कि वह साइट पर कैंप लगाए, ताकि प्रभावित परिवार Pradhan Mantri Awas Yojana के तहत आवेदन कर सकें। कोर्ट ने निर्देश दिए कि हर परिवार के मुखिया को आवेदन के लिए प्रेरित किया जाए। 19 मार्च के बाद कैंप आयोजित किए जाएं, 31 मार्च 2026 से पहले आवेदन जमा करने को प्राथमिकता दी जाए। कलेक्टर नैनीताल पात्रता तय कर स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दें। सुनवाई में यह भी बताया गया कि 13 लोगों के पास फ्रीहोल्ड जमीन है। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में तकनीकी निर्णय विशेषज्ञ ही लेंगे, न कि कब्जाधारी।

कोर्ट का संतुलित रुख

सुप्रीम कोर्ट ने एक ओर सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और रेलवे परियोजना के महत्व को स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर प्रभावित परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर भी चिंता जताई। बेंच ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और कम आय वर्ग (LIG) के लिए बनी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचना चाहिए, लेकिन अवैध कब्जे को स्थायी रूप से जारी नहीं रखा जा सकता। अब राज्य लीगल सर्विसेज अथॉरिटी द्वारा रिपोर्ट दाखिल की जाएगी। कलेक्टर पात्र परिवारों की सूची तैयार कर सुप्रीम कोर्ट को स्टेटस रिपोर्ट देंगे। इसके बाद कोर्ट आगे की दिशा तय करेगा।

सार्वजनिक जमीन पर पुनर्वास मांगना अधिकार नहीं

हल्द्वानी के बनभूलपुरा अतिक्रमण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सार्वजनिक जमीन पर पुनर्वास मांगना अधिकार नहीं है। हालांकि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कोर्ट ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पात्र परिवारों की मदद के लिए ठोस निर्देश दिए हैं। अब सभी की नज़र अगली सुनवाई और राज्य सरकार की रिपोर्ट पर टिकी है।