उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कोटद्वार मामले में आरोपी दीपक कुमार उर्फ ‘मोहम्मद’ दीपक की याचिका खारिज करते हुए उनकी मांगों पर सवाल उठाए और सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने से भी रोक लगा दी।
-
राज्य समीक्षा डेस्क
-
Advertisement
Cheapest Chardham Yatra 2026 Package? The Price Will Shock You!
Planning Chardham in 2026? These 5 Packages Are Getting Booked Fast
Example Ads Media
Image: Uttarakhand High Court Slams Mohammad Deepak
नैनीताल: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कोटद्वार मामले में आरोपी दीपक कुमार उर्फ ‘मोहम्मद’ दीपक की याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने उनके व्यवहार और मांगों पर गंभीर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि एक आरोपी द्वारा पुलिस सुरक्षा की मांग करना उचित नहीं है।कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस तरह की मांगें जांच को प्रभावित करने और मामले को सनसनीखेज बनाने की कोशिश हो सकती हैं।
Uttarakhand High Court Slams ‘Mohammad Deepak’
अदालत ने दीपक कुमार के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। साथ ही कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह मामले की निष्पक्ष जांच जारी रखे और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करे। जस्टिस राकेश थपलियाल ने मामले की सुनवाई के दौरान दीपक को सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से रोक दिया। कोर्ट का मानना है कि सोशल मीडिया पर बयानबाजी से जांच प्रभावित हो सकती है और इससे मामले में अनावश्यक विवाद बढ़ सकता है।
पुलिस सुरक्षा की मांग पर सवाल
अदालत ने दीपक द्वारा पुलिस सुरक्षा की मांग पर भी कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने पूछा कि जब कोई व्यक्ति खुद एक आरोपी है, तो वह पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है। इसे अदालत ने दबाव बनाने की रणनीति बताया।
जानिए क्या है पूरा मामला?
यह मामला 26 जनवरी को कोटद्वार में हुई एक घटना से जुड़ा है, जिसमें दंगा, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के आरोप लगाए गए हैं। जानकारी के अनुसार, एक मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद द्वारा अपनी दुकान का नाम 'बाबा' रखने पर विवाद हुआ था। इस दौरान बजरंग दल के सदस्यों और दीपक के बीच झगड़ा हुआ, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।
जांच जारी रखने के निर्देश
कोर्ट ने पुलिस को जांच जारी रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि जांच के दौरान सुप्रीम कोर्ट के ‘अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए, क्योंकि आरोपों में सजा सात साल से कम है। राज्य सरकार की उस दलील पर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई, जिसमें कहा गया था कि आरोपी जांच में सहयोग करने के बजाय सोशल मीडिया पर अधिक सक्रिय है।