पिथौरागढ़ के धारचूला क्षेत्र की लक्ष्मी मेहता ने स्वरोजगार के जरिए न सिर्फ खुद को सशक्त बनाया, बल्कि 50 महिलाओं को भी रोजगार से जोड़कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Laxmi Mehta Self-Employment Model Empowers 50 Women in Pithoragarh
पिथौरागढ़: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के धारचूला स्थित कालिका गांव में एक महिला ने आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल पेश की है, जो पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन गई है। लक्ष्मी मेहता ने अपने प्रयासों से न केवल खुद को सशक्त बनाया, बल्कि करीब 50 महिलाओं को रोजगार से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखाया।
Laxmi Mehta’s Self-Employment Model Empowers 50 Women in Pithoragarh
पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका लंबे समय तक घर और खेती तक सीमित रही है। लेकिन अब कालिका गांव की महिलाएं इन दायरों से बाहर निकलकर आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं और अपनी पहचान बना रही हैं। लक्ष्मी मेहता ने करीब 20 नाली जमीन पर मत्स्य पालन, जैविक खेती और पोल्ट्री फार्म की शुरुआत की।
उन्होंने जमीन को समतल कर मत्स्य टैंक बनाए, जैविक सब्जियों का उत्पादन शुरू किया और अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर इस कार्य से जोड़ा। आज उनके पास चार मत्स्य टैंक, एक विकसित पोल्ट्री फार्म और सैकड़ों की संख्या में बतख, खरगोश व हंस हैं। इसके साथ ही मशरूम उत्पादन और जैविक साग-सब्जियों की खेती भी बड़े स्तर पर की जा रही है।
सेना और सुरक्षा बलों को सप्लाई
लक्ष्मी के इस प्रयास का सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा कि अब गांव की महिलाएं भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, सशस्त्र सीमा बल और भारतीय सेना को मछली, अंडे और सब्जियों की आपूर्ति कर रही हैं। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ा है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में ताजा उत्पाद भी उपलब्ध हो रहे हैं।
कोरोना काल के बाद आया बदलाव
मूल रूप से मुनस्यारी की रहने वाली लक्ष्मी का विवाह धारचूला में हुआ, उनके पति सेना में हैं। कोरोना काल के बाद उन्होंने कुछ नया करने का संकल्प लिया और गांव की आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को सशक्त बनाने का लक्ष्य तय किया। लक्ष्मी की मेहनत रंग लाई और आज उनका वार्षिक लेन-देन करीब 10 लाख रुपये तक पहुंच चुका है। उनकी पहल से क्षेत्र में मत्स्य पालन और जैविक खेती को भी बढ़ावा मिला है।
सामाजिक और राजनीतिक पहचान
लक्ष्मी की सफलता और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उन्हें भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर महिला मोर्चा का जिलाध्यक्ष भी बनाया गया है। यह उनकी सामाजिक स्वीकार्यता और नेतृत्व की पहचान को दर्शाता है।
लक्ष्मी मेहता की कहानी यह साबित करती है कि मजबूत इरादे और मेहनत से पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों में भी सफलता हासिल की जा सकती है।