बेरीनाग की दो बेटियों ने तोड़ी रूढ़िवादी परंपराएं, पिता को दी मुखाग्नि.. हर किसी की आंख नम

पिथौरागढ़ के बेरीनाग में दो बेटियों ने सामाजिक परंपराओं को तोड़ते हुए अपने पिता को मुखाग्नि दी। इस भावुक घटना ने समाज को नई सोच दी और महिला सशक्तिकरण का संदेश फैलाया।
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Daughters Break Social Barriers: Daughters Perform Last Rites of Father Break Social Norms
Image: Daughters Perform Last Rites of Father Break Social Norms

पिथौरागढ़: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने समाज की सोच को झकझोर कर रख दिया। बेरीनाग क्षेत्र में दो बेटियों ने अपने पिता के अंतिम संस्कार में मुखाग्नि देकर सदियों पुरानी परंपराओं को चुनौती दी।

Daughters Perform Last Rites of Father Break Social Norms

बेरीनाग विकासखंड के ग्राम पंचायत नैनीशतला के मोना गांव निवासी नंदन सिंह दशौनी का सोमवार देर रात बीमारी के चलते निधन हो गया। परिवार में कोई पुत्र नहीं होने के कारण ग्रामीणों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि अंतिम संस्कार की रस्में कौन निभाएगा। ऐसे समय में नंदन सिंह की विवाहित बेटियां हेमा कार्की और नीमा कार्की आगे आईं। उन्होंने न सिर्फ अपने पिता की अर्थी को कंधा देने का निर्णय लिया, बल्कि मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी भी खुद उठाई।

  • परंपराओं को तोड़ते हुए दी मुखाग्नि

    Daughters Perform Last Rites of Father Break Social Norms
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    Image: Daughters Perform Last Rites of Father Break Social Norms

    मंगलवार सुबह अंतिम यात्रा के दौरान दोनों बेटियों ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया और थल रामगंगा नदी तट पहुंचकर पूरे विधि-विधान से चिता को मुखाग्नि दी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गईं। इस भावुक पल को देखकर हर कोई भावुक हो उठा। ग्रामीणों ने कहा कि बेटियों ने बेटे का फर्ज निभाकर समाज के लिए एक नई मिसाल कायम की है।

  • बेटियों ने उठाया साहसिक कदम

    Daughters Perform Last Rites of Father Break Social Norms
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    Image: Daughters Perform Last Rites of Father Break Social Norms

    बताया जा रहा है कि एक वर्ष पहले ही उनकी मां का भी बीमारी के कारण निधन हो गया था। ऐसे में बेटियों ने अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाते हुए यह साहसिक कदम उठाया।

    यह घटना न केवल एक भावुक कहानी है, बल्कि यह समाज को यह भी सिखाती है कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं। बदलते समय के साथ सामाजिक सोच में बदलाव जरूरी है, और यह घटना उसी बदलाव की एक मजबूत मिसाल है।