रुद्रप्रयाग: भगवान विष्णु को क्यों चढ़ाई जाती है जौ की हरियाली? त्रियुगीनारायण से जुड़ी है सदियों पुरानी परंपरा

शिव-पार्वती की पावन विवाह स्थली त्रियुगीनारायण में धुर्वाष्टमी के अवसर पर ऐतिहासिक हरियाली मेला धूमधाम से मनाया गया। ग्रामीणों ने घरों में उगाई जौ की हरियाली को भगवान विष्णु को अर्पित किया और फिर प्रसाद स्वरूप गांव के घर-घर पहुंचाकर बुजुर्गों से आशीर
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Triyuginarayan Hariyali Mela 2026: Triyuginarayan Hariyali Mela Celebrated with Traditional Rituals
Image: Triyuginarayan Hariyali Mela Celebrated with Traditional Rituals

रुद्रप्रयाग: भगवान शिव और माता पार्वती की पावन विवाह स्थली के रूप में प्रसिद्ध उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर में ऐतिहासिक हरियाली मेला श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। धुर्वाष्टमी के अवसर पर आयोजित इस धार्मिक पर्व में पूरी केदारघाटी पौराणिक परंपराओं, लोक संस्कृति और आस्था के रंग में रंगी नजर आई।

Triyuginarayan Hariyali Mela Celebrated with Traditional Rituals

इस अवसर पर स्थानीय ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में मंदिर पहुंचे। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से जौ की हरियाली की पूजा-अर्चना की और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सबसे पहले इसे भगवान विष्णु को अर्पित किया। इसके बाद हरियाली को गांव के घर-घर ले जाकर प्रसाद के रूप में वितरित किया गया।

सात दिन पहले घरों में उगाई गई थी जौ की हरियाली

त्रियुगीनारायण गांव में हरियाली पर्व की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। परंपरा के अनुसार ग्रामीण महिलाएं पर्व से करीब सात दिन पहले अपने-अपने घरों में जौ की हरियाली उगाती हैं। धुर्वाष्टमी के दिन घरों में तैयार की गई इस हरियाली को विधि-विधान से एकत्र किया गया। इसके बाद महिलाएं और ग्रामीण इसे लेकर त्रियुगीनारायण मंदिर पहुंचे। मंदिर में पुजारी ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हरियाली का पूजन कराया। पूजा के बाद जौ की हरियाली सबसे पहले भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित की गई। यह परंपरा त्रियुगीनारायण की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। इसी तरह की परंपरा में हरियाली को भगवान नारायण को अर्पित करने का उल्लेख पुराने स्थानीय आयोजनों की रिपोर्टों में भी मिलता है।

घर-घर पहुंचाई गई हरियाली, बुजुर्गों से लिया आशीर्वाद

मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद ग्रामीण हरियाली को अपने गांव के प्रत्येक घर में लेकर पहुंचे। बुजुर्गों को हरियाली भेंट की गई और उनका आशीर्वाद लिया गया। आगे पढ़िए..

ग्रामीणों के अनुसार, यह सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आपसी भाईचारे और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। हरियाली को शुभता, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक मानते हुए लोग इसे श्रद्धापूर्वक अपने घरों में स्थापित करते हैं। पर्व के दौरान पारंपरिक गीतों और धार्मिक जयकारों से त्रियुगीनारायण का वातावरण भक्तिमय हो गया। स्थानीय लोगों के साथ श्रद्धालुओं में भी इस प्राचीन परंपरा को लेकर खासा उत्साह दिखाई दिया।

शिव-पार्वती की विवाह स्थली है त्रियुगीनारायण

त्रियुगीनारायण मंदिर को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह स्थल के रूप में विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। यही वजह है कि यहां आयोजित होने वाले धार्मिक पर्वों और मेलों में स्थानीय परंपराओं के साथ-साथ देशभर के श्रद्धालुओं की भी आस्था जुड़ी हुई है। इसी क्षेत्र में आयोजित होने वाला वामन द्वादशी मेला भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। पिछले आयोजनों में भगवान वामन के दर्शन और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मेले का आयोजन किया जाता रहा है।

भगवान विष्णु को जौ की हरियाली चढ़ाने की क्या है मान्यता?

त्रियुगीनारायण में हरियाली पर्व से जुड़ी एक पौराणिक मान्यता भगवान विष्णु के वामन अवतार से संबंधित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेने से कुछ दिन पहले माता अदिति और देव कन्याओं को अपने विराट स्वरूप के दर्शन कराए थे। भगवान के दिव्य स्वरूप से प्रसन्न होकर माता अदिति और देव कन्याओं ने उन्हें जौ की हरियाली भेंट की थी। इसी मान्यता के बाद से त्रियुगीनारायण में धुर्वाष्टमी के अवसर पर भगवान नारायण को सबसे पहले जौ की हरियाली अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है। स्थानीय धार्मिक परंपरा से जुड़ी पुरानी रिपोर्टों में भी इसी कथा का उल्लेख मिलता है।

वामन द्वादशी मेले में भी हरियाली का विशेष महत्व

त्रियुगीनारायण में हरियाली पर्व के बाद वामन द्वादशी का धार्मिक आयोजन भी विशेष महत्व रखता है। परंपरा के अनुसार हरियाली को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं तक पहुंचाया जाता है। इससे स्थानीय लोगों का मानना है कि आने वाली पीढ़ियों तक त्रियुगीनारायण की पौराणिक परंपराओं और धार्मिक विरासत को जीवित रखने में मदद मिलती है।

लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था का संगम

हरियाली मेले के दौरान त्रियुगीनारायण में केवल पूजा-अर्चना ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिली। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे ग्रामीण, पौराणिक गीत, धार्मिक जयकारे और सामूहिक अनुष्ठान ने पूरे आयोजन को विशेष बना दिया। ग्रामीणों के लिए यह पर्व अपनी जड़ों, धार्मिक आस्था और सामाजिक रिश्तों से जुड़ने का अवसर भी है। यही वजह है कि हर वर्ष इस परंपरा को श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ाया जाता है। त्रियुगीनारायण का यह हरियाली पर्व एक ओर जहां भगवान विष्णु से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं को जीवित रखता है, वहीं दूसरी ओर केदारघाटी की समृद्ध लोक संस्कृति और सामुदायिक एकजुटता की तस्वीर भी पेश करता है।