देवभूमि का ब्रह्मकपाल...जहां भगवान शिव को मिली थी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति

अगर आप बदरीनाथ आते हैं तो ब्रह्मकपाल जरूर आएं। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी।
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उत्तराखंड: Story of brahma kapal uttarakhand
Image: Story of brahma kapal uttarakhand

: देवभूमि उत्तराखंड मानवों के साथ-साथ देवताओं के लिए भी वंदनीय बताई गई है। इसी देवभूमि में एक ऐसा तीर्थ है, जहां भगवान शिव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। कहा जाता है कि पितरों को मोक्ष प्रदान करने वाले इस तीर्थ में पिंडदान करने का फल गया से आठ गुना ज्यादा मिलता है। ये धाम है बदरीनाथ में स्थित ब्रह्मकपाल...जहां भगवान भोलनेनाथ को ब्रह्महत्या से मुक्ति मिली थी। कहा जाता है कि यहां पर पिंडदान करने से पितरों को नर्क से मुक्ति मिलती है। ब्रह्मकपाल को गया से आठ गुना ज्यादा फलदायी पितर कारक तीर्थ कहा गया है। बदरीनाथ के पास स्थित ब्रह्मकपाल में पिंडदान और तर्पण का विशेष महत्व है। यहां भगवान शिव और पांडवों को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। वेदों और पुराणों में भी इस जगह का जिक्र किया गया है। आइए आपको वो पौराणिक कहानी भी बताते हैं।

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इस जगह का संबंध सृष्टि की उत्पत्ति से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि जब ब्रह्मा ने अपनी पुत्री प्रथ्वी पर गलत दृष्टि डाली तो, शिव ने त्रिशूल से ब्रह्मा का एक सिर धड़ से अलग कर दिया। ब्रह्मा का सिर शिव के त्रिशूल पर चिपक गया और उन्हें ब्रह्महत्या का पाप भी लगा था। बाद में ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए शिव को धरती पर आना पड़ा। बदरीनाथ से 500 मीटर की दूरी जहां त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर अलग होकर गिरा था, उसी जगह को आज ब्रह्मकपाल कहा जाता है। जब महाभारत के युद्ध में पांडवों ने अपने ही बंधु-बांधवों को मार कर विजय प्राप्त की थी तब उन पर गौत्र हत्या का पाप लगा था। गौत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्ग की ओर जा रहे पांडवों ने भी इसी स्थान पर अपने पितरों को तर्पण दिया था। श्रीकृष्ण के कहने पर पांडवों ने भी यहां महाभारत में मारे गए लोगों और पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्ध किया था। कहा जाता है कि ब्रह्मकपाल में श्राद्ध करने से पितरों को प्रेत योनि से जल्द मुक्ति मिलती है। यहां तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।