देवभूमि के इस गांव में मिला डायनोसोर का ‘भोजन’, लाखों साल से मौजूद है फर्न ट्री का अस्तित्व

चमोली के कंडारा गांव में दुर्लभ फर्न ट्री मिला है...इस फर्न ट्री को संरक्षण की जरूरत है।
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Peaceful and untouched trekking routes away from the crowds. Hidden trails where nature still remains raw and pure.

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linguda: linguda furn tree uttarakhand dianasor food
Image: linguda furn tree uttarakhand dianasor food

: डायनासोर को खत्म हुए लाखों साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी ये जीव हमारे किस्से-कहानियों और कल्पनाओं का हिस्सा है। सदियों पहले उत्तराखंड में डायनासोर रहते थे या नहीं ये तो नहीं पता, लेकिन हां हाल ही में यहां एक ऐसा दुर्लभ फर्न ट्री मिला है जो कि डायनोसोर के समय यानि जुरासिक काल का है। चमोली जिले के बद्रीनाथ नेशनल हाइवे पर पड़ने वाले सुनाला गांव से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित कंडारा गांव में ये दुर्लभ फर्न देखा गया, जो कि वाकई चौंकाने वाली खबर है। लिविंग जीवाश्म फर्न जुरासिक काल में मिला करते थे, तब इस धरती पर भीमकाय डायनोसोर मिलते थे। उस वक्त इन पेड़ों की ऊंचाई लगभग 50 से 70 फीट तक हुआ करती थी। फर्न के इन पेड़ों को विशाल जीव अपना भोजन बनाते थे, लोकभाषा में लिविंग फर्न को लिंगुड़ा कहा जाता है।

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कंडारा गांव में काली माता मंदिर के पास इस दुर्लभ फर्न ट्री को देखा गया है, जो कि विलुप्त फर्न प्रजातियों में से एक है। जुरासिक काल में मिलने वाले इस फर्न ट्री की ऊंचाई 12 से 13 फीट है। दो से ढाई फीट व्यास वाला ये पेड़ सदियों पुराना है, यही वजह है कि स्थानीय लोग इसकी पूजा करते हैं, इसे देवता का दर्जा देते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस ऐतिहासिक फर्न ट्री को संरक्षित करने की जरूरत है। फर्न विशेषज्ञ भूपेंद्र खोलिया कहते हैं कि इस फर्न का तना सौलट्री होता है, एक बार कटने पर इसमें कली नहीं निकलती यही वजह है कि ये जल्दी खत्म हो जाता है। इसके संरक्षण के लिए केवल यही एक तरीका है कि जहां भी ये मिले इसके एक किलोमीटर तक के स्थल को पांच साल के लिए संरक्षित किया जाए। कभी भीमकाय डायनोसोर का भोजन रहा फर्न ट्री अब विलुप्त होने की कगार पर है। जैव विविधता के मामले में उत्तराखंड काफी धनी और सौभाग्यशाली रहा है, लेकिन अगर फर्न ट्री की दुर्लभ प्रजाति को जल्द ही संरक्षित नहीं किया गया तो एक दिन ये भी डायनोसोर की तरह लुप्त हो जाएगी।