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देहरादून: कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के 75 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। इन जवानों ने देश की सेवा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। शहीदों की याद में आज का दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
उत्तराखंड को वीरों की भूमि यूं ही नहीं कहा जाता। इस राज्य का सैन्य इतिहास वीरता और पराक्रम के अनगिनत किस्सों से भरा हुआ है। यहां के लोकगीतों में शूरवीरों की जिन गाथाओं का जिक्र मिलता है, वे प्रदेश की सीमाओं से परे देश-विदेश तक फैली हुई हैं। कारगिल युद्ध की वीर गाथा भी इस वीरभूमि के बिना अधूरी है। इस युद्ध में उत्तराखंड के 75 वीर सैनिकों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। कारगिल युद्ध के 26 साल बीत चुके हैं यह युद्ध शहीद जवानों के अदम्य साहस और उनके सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है। कारगिल की वीरता को देश हमेशा याद रखेगा। इस युद्ध के बाद भारत की सेना का पराक्रम पूरी दुनिया ने स्वीकार किया। भारतीय सेनाओं की ताकत को कई बार विश्व की अन्य सेनाओं ने देखा है।
26 जुलाई को भारतीय सेना की वीरता और बलिदान के सम्मान में विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन 1999 में भारतीय सेना ने कारगिल में पाकिस्तानी सेना को धूल चटा दी थी। लद्दाख में हुए इस युद्ध के दौरान उत्तराखंड के 75 वीर जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। कारगिल युद्ध की 26वीं वर्षगांठ पर हम उन रणबांकुरों को याद करते हैं जिन्होंने देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। देवभूमि के वीर सपूत हमेशा से देश की सुरक्षा और सम्मान के लिए अग्रणी रहे हैं। आज भी यहां के युवाओं में सेना में शामिल होने का जुनून बरकरार है। इस युद्ध में गढ़वाल राइफल्स के 47 जवान शहीद हुए, जिनमें से 41 वीर जवान उत्तराखंड के थे। कुमाऊं रेजिमेंट के भी 16 बहादुर जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी। उत्तराखंड के इन वीर सपूतों को 15 सेना मेडल, 2 महावीर चक्र, 9 वीर चक्र और 11 मेंशन इन डिस्पैच से सम्मानित किया गया। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर भारतीय सेना के अदम्य साहस व शौर्य को हम नमन करते हैं तथा कारगिल युद्ध में देश की सीमाओं की रक्षा के लिए वीर सैनिकों के बलिदान को राष्ट्र हमेशा याद रखेगा।