उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों की संख्या बढ़ रही है, जो एक ओर महत्वपूर्ण जल संसाधन मानी जाती हैं, लेकिन समय के साथ इनका खतरा भी बढ़ रहा है। ये झीलें धीरे-धीरे प्राकृतिक आपदा का कारण बनने लगी हैं।
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Image: Five High Risk Glacial Lakes of Uttarakhand
पिथौरागढ़: जलवायु परिवर्तन से हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के साथ पांच संवेदनशील झीलों का अध्ययन करेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार, बढ़ता तापमान हिमालय के लिए खतरे की घंटी है।
Five High Risk Glacial Lakes of Uttarakhand
हिमालयी ग्लेशियर जो सदियों से जलवायु और पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखते आए हैं, अब जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण तेजी से पिघल रहे हैं। इसका परिणाम ग्लेशियरों के टूटने और उनके आसपास बड़ी ग्लेशियल झीलों के निर्माण में देखा जा रहा है। इन झीलों का आकार साल दर साल बढ़ता जा रहा है जिससे आपदा का खतरा भी बढ़ गया है। 2013 में केदारनाथ आपदा और 2023 में सिक्किम में आई त्रासदी, दोनों ही ग्लेशियल झीलों के फटने का नतीजा थीं। इसरो ने उत्तराखंड में ऐसी 13 झीलों की पहचान की है, जिनमें से 5 बेहद संवेदनशील मानी जा रही हैं।
झीलों का बढ़ता आकर दे रहा आपदा का संकेत
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी अन्य संस्थानों के साथ मिलकर इन पांच झीलों का अध्ययन कर रहा है। इस अध्ययन का उद्देश्य इन झीलों के बढ़ते आकार और उनके टूटने की संभावना का विश्लेषण करना है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने पाया है कि भीलंगना नदी बेसिन में 4750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक झील का आकार 1994 से 2022 के बीच लगभग पांच गुना बढ़ गया है, जो अब 0.35 वर्ग किमी तक फैल चुकी है। सर्दियों में यह झील बर्फ से ढकी रहती है, लेकिन वसंत के आते ही बर्फ पिघलने लगती है और झील का आकार तेजी से बढ़ता है। चमोली जिले में स्थित रायकाना ग्लेशियर में वसुंधरा ताल नामक झील तेजी से विकसित हो रही है। 1968 के बाद से इस झील का क्षेत्रफल और आयतन में काफी वृद्धि देखी गई है, जो जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के पिघलने का संकेत है। झीलों का लगातार बढ़ता आकार आने वाले समय में एक बड़ी आपदा का संकेत दे सकता है, इसलिए इसका अध्ययन और निगरानी जरूरी है।
इन पांच झीलों पर चल रहा है अध्ययन
वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड की 5 झीलें उच्च जोखिम वाली हैं। इनमें से तीन झीलें पिथौरागढ़ जिले में स्थित हैं और एक चमोली जिले में है। पिथौरागढ़ जिले की दारमा घाटी में प्यूंग्रू और एक अवर्गीकृत झील, लासरयां घाटी में मबान झील और कुटियांगटी घाटी में एक अवर्गीकृत झील उच्च जोखिम वाली श्रेणी में आती हैं। इसके अलावा चमोली जिले में धौली गंगा बेसिन की वसुधारा ताल भी उच्च जोखिम वाली झीलों में शामिल है। ये सभी झीलें समुद्र तल से 4,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित हैं और इनका आकार 0.02 से 0.50 वर्ग किलोमीटर के बीच है। आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और वाडिया इंस्टीट्यूट मिलकर उत्तराखंड की पांच उच्च जोखिम वाली झीलों का अध्ययन कर रहे हैं। इसका उद्देश्य संभावित खतरों की पहचान करना और उन्हें कम करने के लिए प्रभावी उपाय लागू करना है।