उत्तराखंड में यहाँ शांत हुआ था परशुराम का क्रोध, जानिये प्राचीन सौम्यकाशी का इतिहास

उत्तराखंड के इस जिले में भगवान परशुराम की तपस्थली माना जाता है, जहां उन्होंने वरुणावत पर्वत पर तप कर अपने क्रोध को शांत किया। जानिए पूरी पौराणिक कथा और मंदिर का इतिहास।
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Uttarkashi Parshuram story: Sacred Land Where Lord Parashurama Anger Was Calmed
Image: Sacred Land Where Lord Parashurama Anger Was Calmed

उत्तरकाशी: उत्तराखंड का उत्तरकाशी जिला भगवान परशुराम की तपस्थली के रूप में प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहीं पर उन्होंने अपने क्रोध को शांत करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थान को सौम्यकाशी भी कहा जाता है।

The Sacred Land Where Lord Parashurama’s Anger Was Calmed

भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। कहा जाता है कि माता-पिता के अपमान से क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहीन कर दिया। लेकिन इतना सब करने के बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। भगवान शिव की सलाह पर परशुराम उत्तरकाशी पहुंचे और वरुणावत पर्वत पर कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या के बाद उनका रौद्र रूप शांत हो गया और वे सौम्य हो गए। इसी वजह से उत्तरकाशी को सौम्यकाशी नाम मिला।

परशुराम के क्रोध की पौराणिक कहानी

परशुराम, ऋषि ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। एक बार हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन अपने सैनिकों के साथ उनके आश्रम पहुंचे। ऋषि जमदग्नि ने दिव्य गाय कामधेनु की मदद से उनका भव्य स्वागत किया। लेकिन कामधेनु की शक्तियों को देखकर सहस्त्रार्जुन उसे जबरन ले जाना चाहता था। मना करने पर उसने आश्रम को नष्ट कर दिया। जब परशुराम लौटे और उन्होंने यह सब देखा, तो वे क्रोधित हो उठे और उन्होंने सहस्त्रार्जुन व उसकी सेना का संहार कर दिया। इसके बाद उन्होंने 21 बार क्षत्रियों का विनाश किया। आगे पढ़िए..

बाड़ाहाट में स्थित प्राचीन परशुराम मंदिर

उत्तरकाशी के बाड़ाहाट क्षेत्र में भगवान परशुराम का प्राचीन मंदिर स्थित है। मंदिर के गर्भगृह में कमल के आकार के पत्थर पर मूर्ति स्थापित है, जिसमें भगवान विष्णु के 24 अवतारों की झलक देखने को मिलती है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख के अनुसार, इसका जीर्णोद्धार वर्ष 1842 में टिहरी नरेश सुदर्शन शाह के मंत्री धर्मदत्त द्वारा कराया गया था।

परशुराम जन्मोत्सव और शोभायात्रा

मंदिर के पुजारी शैलेंद्र नौटियाल के अनुसार, परशुराम जन्मोत्सव के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, श्रृंगार और सुंदरकांड का पाठ किया जाएगा। इसके बाद दिन में 11 बजे मंदिर से भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। पूरे दिन मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन का आयोजन भी होगा।

आध्यात्मिक महत्व और मान्यता

हिमालय की गोद में स्थित वरुणावत पर्वत आज भी आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। मान्यता है कि यहीं पर भगवान परशुराम का रौद्र रूप शांत होकर सौम्य बना था। यही वजह है कि उत्तरकाशी को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।