Joshimath sinking: जोशीमठ में भूधंसाव को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। जांच में पाया गया कि जमीन के अंदर 80 मीटर तक ठोस चट्टान नहीं है। वैज्ञानिकों ने बढ़ते खतरे को लेकर चेतावनी दी है।
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Big revelation regarding landslide in Joshimath
चमोली: जोशीमठ में दिसंबर 2022 से शुरू हुआ भूधंसाव आज भी चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है। जनवरी 2023 में यह संकट चरम पर पहुंच गया था, जब 700 से अधिक घरों में दरारें आ गई थीं और लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े थे। इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार ने स्थिति को गंभीरता से लेते हुए वैज्ञानिक संस्थानों से जांच कराई और राहत, पुनर्वास व पुनर्निर्माण की योजनाओं पर काम शुरू किया।
Big revelation regarding landslide in Joshimath
हाल ही में कराई गई एक विस्तृत जांच में यह हैरान करने वाली बात सामने आई है कि जोशीमठ क्षेत्र में जमीन के भीतर करीब 80 मीटर तक ठोस चट्टान (हार्ड रॉक) मौजूद ही नहीं है। इस तथ्य ने क्षेत्र की भौगोलिक स्थिरता को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
यह मुद्दा वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान में पृथ्वी दिवस के अवसर पर आयोजित “हिमालय की आपदाएं: कारण और चुनौतियां” विषयक कार्यशाला में भी उठा। इस दौरान राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य डॉ. दिनेश असवाल ने कहा कि इन निष्कर्षों पर गहराई से निगरानी रखने की जरूरत है और सभी कार्य वैज्ञानिक आधार पर ही किए जाने चाहिए।
नदी की दिशा में खिसक रहा भूभाग
विशेषज्ञों के अनुसार जोशीमठ का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे नदी की दिशा में खिसक रहा है। इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ढलानों को स्थिर करने हेतु रॉक बोल्टिंग जैसे उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।< br/>रॉक बोल्टिंग के लिए जमीन के भीतर ड्रिलिंग कर चट्टानों की मजबूती का आकलन किया गया। विभिन्न स्थानों पर 50 से 80 मीटर तक ड्रिलिंग करने के बावजूद कहीं भी ठोस चट्टान नहीं मिली। ऐसे में यह तकनीक प्रभावी साबित होगी या नहीं, इस पर भी सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि यह प्रक्रिया सामान्यतः 10–12 मीटर गहराई तक ही कारगर होती है।
ग्लेशियर मलबे पर बसा है जोशीमठ
अध्ययनों से यह भी संकेत मिले हैं कि पूरा जोशीमठ क्षेत्र ग्लेशियरों द्वारा छोड़े गए मलबे पर बसा हुआ है। जब प्राचीन समय में ग्लेशियर पीछे हटे, तो वे भारी मात्रा में मलबा छोड़ गए, जिस पर समय के साथ मानव बसावट हो गई। यही कारण है कि जमीन अंदर से ठोस नहीं है और धंसाव का खतरा लगातार बना हुआ है।
विशेषज्ञों की चेतावनी और आगे की जांच
इस पूरे मामले पर विशेषज्ञों का कहना है कि जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष आने का इंतजार किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में जो भी कार्य किए जाएं, वे पूरी तरह वैज्ञानिक और टिकाऊ होने चाहिए, ताकि किसी बड़े खतरे से बचा जा सके।
जोशीमठ की मौजूदा स्थिति एक गंभीर भूगर्भीय संकट की ओर इशारा करती है। जमीन के भीतर ठोस चट्टान का अभाव और भूभाग का लगातार खिसकना इस क्षेत्र के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। ऐसे में समय रहते वैज्ञानिक और प्रशासनिक स्तर पर ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है।