महाभारत युद्ध के बाद जिक्र आता है स्वर्गारोहिणी का। उत्तराखंड में मौजूद स्वर्ग की ये सीढ़ियां रहस्य और रोमांच की कहानी बयां करती हैं।
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कोमल नेगी
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Hidden Gem Treks of Kedar Himalaya You Must Explore Once in Life
Peaceful and untouched trekking routes away from the crowds. Hidden trails where nature still remains raw and pure.
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Image: Uttarakhand Swargarohini story
: इंसान को आध्यात्मिकता से जोड़े रखने के लिए स्वर्ग-नरक की कहानियां सदियों से लिखी जाती रही हैं। स्वर्ग हमेशा से इंसानों की कल्पना का आधार रहा है, लेकिन देवभूमि में एक जगह ऐसी भी है जो इस कल्पना को हकीकत मानने पर मजबूर कर देती है। देवभूमि में बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर बनीं हैं वो सीढ़ियां जो कि सीधे स्वर्ग तक जाती हैं। स्वर्गारोहिणी ही वह जगह है जहां पहुंचते-पहुंचते इंसान सांसारिकता से दूर होकर आध्यात्मिकता के करीब पहुंच जाता है। यहां आने वाले को प्रकृति की गोद में जिस सुख का अहसास होता है, वो किसी स्वर्ग से कम नहीं। आपने पढ़ा भी होगा कि कि धर्मराज युधिष्ठिर ने एक श्वान के साथ स्वर्गारोहिणी से वैकुंठ के लिए प्रस्थान किया था। स्वर्गारोहिणी पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को बदरीनाथ धाम से नारायण पर्वत तक 30 किलोमीटर का सफर तय करना होता है।
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ये रास्ता ज्यादातर बर्फ से ढका रहता है, जिस वजह से सफर पूरा होने में तीन दिन लग जाते हैं। स्वर्गारोहिणी के बारे में कहा जाता है कि राजपाठ त्यागने के बाद पांडव इसी रास्ते स्वर्ग गए थे। भीम, नकुल, अर्जुन, सहदेव और द्रोपदी स्वर्गारोहिणी पहुंचने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए, लेकिन युधिष्ठर ने पुष्पक विमान से सशरीर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। स्वर्गारोहिणी की यात्रा बेहद कठिन है, लेकिन यहां का मनोरम सौंदर्य और प्रकृति के खूबसूरत नजारे श्रद्धालुओं का उत्साह बनाए रखते हैं। बदरीनाथ धाम से 10 किमी की दूरी पर लक्ष्मी वन, फिर 10 किमी आगे चक्रतीर्थ और उसके बाद छह किमी आगे सतोपंथ पड़ता है। यहां से चार किमी खड़ी चढ़ाई चढ़कर होते हैं स्वर्गारोहिणी के दर्शन। यहां 14300 फीट की ऊंचाई पर सतोपंथ झील है।
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कहा जाता है कि स्वर्गारोहण के दौरान पांडवों ने सतोपंथ झील में स्नान किया था। मान्यता है कि एकादशी पर स्वयं ब्रह्मा, विष्णु व महेश यहां स्नान करने आते हैं। यात्री स्वर्गारोहिणी पहुंचकर इस झील की परिक्रमा जरूर करते हैं। स्वर्गारोहिणी जाने के लिए जोशीमठ तहसील प्रशासन की अनुमति जरूरी है। इसके अलावा वन विभाग से भी यहां जाने की अनुमति लेनी पड़ती है। क्योंकि यह क्षेत्र नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के अधीन आता है। पोर्टर व गाइड की व्यवस्था यात्रियों को खुद करनी होती है।यकीन मानिए अगर आप एक बार यहां आएंगे तो खुद को किसी दिव्य वातावरण में पाएंगे। एक बार कदम रखने पर यहां से वापस जाने का मन नहीं करता।