नमन: देवभूमि की महान नृत्यांगना गजला देवी नहीं रहीं..1956 में केदार नृत्य से जीता था देश का दिल

केदार नृत्य की प्रख्यात नृत्यांगना गजला देवी ने साल 1956 और 1960 में गणतंत्र दिवस की परेड में लोकनृत्य की प्रस्तुति दी थी।
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Ghazala Devi: Great dancer Ghazala Devi dies
Image: Great dancer Ghazala Devi dies

टिहरी गढ़वाल: पहाड़ की केदार नृत्य कला को देश-दुनिया में पहचान दिलाने वाली प्रख्यात नृत्यांगना गजला देवी नही रहीं। नृत्यांगना गजला देवी का टिहरी के ढुंग, बजियाल गांव (अखोड़ी) में निधन हो गया। वो पिछले कई दिनों से बीमार थीं, रविवार को उन्होंने अपने घर पर अंतिम सांस ली। भले ही सोशल मीडिया के इस दौर में आज भी लोग गजला देवी के बारे में ज्यादा न जानते हों, लेकिन वो उत्तराखंड की उन पहली जीवट महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने केदार नृत्य जैसी लोककला को सहेजने के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। केदार नृत्य की नृत्यांगना के रूप में मशहूर गजला देवी ने साल 1956 और 1960 में गणतंत्र दिवस की परेड में नृत्य की प्रस्तुति दी थी। उस वक्त सोशल मीडिया नहीं हुआ करता था, लेकिन गजला देवी घर-घर में पहचानी जाने लगी थीं। साल 1956 और 1960 में उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणि बडोनी के निर्देशन में गढ़वाल की यह टीम उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने के लिए गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल हुई थी। आगे पढ़िए

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टीम में गजला देवी के साथ उनके पति भी शामिल थे। तब गजला मात्र 18 या 19 साल की थीं। गजला देवी के पति शिवजनी टिहरी गढ़वाल ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के श्रेष्ठ और पारंगत ढोल वादक व लोक गायक हैं, लेकिन कहते हैं न जहां सरस्वती होती हैं, वहां लक्ष्मी नहीं ठहरती। दशकों पहले भी लोक कलाकारों को रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता था। गजला और उनके पति शिवजनी भी कई दशकों से गांव की छानियों में जीवन यापन करते रहे। बीते साल गजला देवी ने केदार नृत्य कला को सहेजने के लिए नई टिहरी में एक कार्यशाला शुरू की थी, लेकिन कोरोना के चलते ये काम भी आगे नहीं बढ़ पाया। गजला का पूरा जीवन मुफलिसी में बीता। रविवार को केदार नृत्य की ये मशहूर नृत्यांगना बाबा केदार में विलीन हो गई। गजला अपने पीछे बेटा, बेटियां और नाती, पोतों से भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं।