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उधमसिंह नगर: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड के की पांचवीं विधानसभा चुनावों के लिए अपने 59 प्रत्याशियों को चुनावी रण में उतार दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को उनकी पारंपरिक विधानसभा सीट खटीमा से चुनाव में उतारा गया है। पुष्कर सिंह धामी भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में लाने में कामयाब होते हैं या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा मगर फिलहाल उनके सामने दो बड़े मिथक तोड़ने की चुनौती है। उत्तराखंड राज्य का गठन होने के बाद से ही चुनावों को लेकर दो बड़े मिथक हैं जिनको तोड़ना किसी भी मुख्यमंत्री के लिए मुमकिन नहीं हो सका है। अगर इस बार पुष्कर सिंह धामी यह दोनों मिथक तोड़ने में कामयाब हो जाते हैं तो न केवल वे इतिहास रच डालेंगे बल्कि भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में एक बार फिर से आने से कोई नहीं रोक सकता। पहला मिथक मुख्यमंत्री से ही जुड़ा हुआ है। उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद से ही हुए 4 विधानसभा चुनावों का इतिहास रहा है कि मुख्यमंत्री रहते हुए जिस भी राजनेता ने चुनाव लड़ा है उसे बुरी तरह से पराजय का सामना करना पड़ा है। चाहे वह पूर्व मुख्यमंत्री जनरल बीसी खंडूरी हो या फिर हरीश रावत। 2012 के विधानसभा चुनावों की बात है। जहां पर भाजपा ने खंडूरी हैं जरूरी का नारा दिया था लेकिन उस समय उनको कोटद्वार विधानसभा सीट से बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था। उन को हराने वाले कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी थे। 2017 में हरीश रावत किच्छा विधानसभा सीट से चुनाव लड़े थे जहां पर उनको बुरी तरह से हार का मुंह देखना पड़ा था। ऐसे में अगर इस बार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खटीमा से चुनाव जीत जाते हैं तो इस बड़े मिथक को तोड़ने में कामयाब रहेंगे।
धामी पिछले 10 साल से खटीमा विधानसभा सीट से विधायक हैं और इस सीट पर यह उनका तीसरा चुनाव है इसलिए वह अपनी जीत को लेकर बेहद आश्वस्त हैं। टिकटों के ऐलान से पहले यह चर्चा थी कि वह खटीमा की जगह डीडीहाट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं मगर उन्होंने खुद खटीमा से चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। ऐसे में पार्टी ने उनको खटीमा से मैदान में उतार दिया है। यह तो बात रही पहले मिथक की जिसको अब तक उत्तराखंड का कोई भी मुख्यमंत्री तोड़ नहीं पाया है। अब बात करते हैं दूसरे मिथक की। यह मिथक है उत्तराखंड में लगातार दूसरी बार सरकार ना बना पाने का। जी हां, इस बार मुख्यमंत्री धामी के सामने उत्तराखंड में लगातार दूसरी बार सरकार ना बना पाने का मिथक तोड़ने की चुनौती है। यह मिथक पिछले चार चुनावों से बना हुआ है, जिसको अभी तक कोई भी नहीं तोड़ सका है। उत्तराखंड में जिसकी भी सरकार बनती है अगली बार उसकी सरकार नहीं बनी। 2002 में प्रदेश में कांग्रेस पार्टी सत्ता पर विराजमान हुई। 2007 में सत्ता से बाहर हो गई। भाजपा की सरकार बनी फिर 2012 में भाजपा को सत्ता से बाहर होना पड़ा और उसके बाद सत्ता की बागडोर एक बार फिर से कांग्रेस के हाथों में आ गई। 2017 में एक बार फिर से कांग्रेस की सत्ता से विदाई हुई और भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई। इस तरह पिछले चार चुनाव में एक दल लगातार दूसरी बार सरकार नहीं बना पाया है। ऐसे में अगर भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बना दी तो उत्तराखंड में लंबे समय से चला आ रहा यह मिथक भी टूट जाएगा। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक का कहना है कि भाजपा ने अब की बार 60 बार का नारा दिया है और पार्टी को पूरा भरोसा है कि उत्तराखंड को अगले 5 साल में देश का अग्रणी राज्य बनाने के लिए जनता भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करेगी।