देवभूमि में कई साल बाद खुला एक घर का दरवाजा, 200 साल पुरानी दुर्लभ विरासत मिली !

इसी गांव में कुछ दिन पहले बदरीनाथ धाम की आरती की पुरानी पांडुलिपियां मिली थीं। अब एक बार फिर से ये गांव चर्चाओं में है।
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rudraprayag: pandulipi faound in rudraprayag district
Image: pandulipi faound in rudraprayag district

रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड में ऐसे ऐसे प्रकांड विद्वान हुए हैं, जो अब तक भले ही दुनिया से अनजान रहे हों। लेकिन अब जब दुनिया के सामने ये बातें खुलकर सामने आ रही हैं, तो हैरानी हो रही है। हाल ही में रुद्रप्रयाग जिले के स्यूपुरी गांव पर देशभर की नज़रें टिक गईं थी। इस गांव के ठाकुर महेन्द्र सिंह बर्तवाल के घर में बदरीनाथ धाम की आरती की पांडुलिपियां मिलीं थीं। एक बार फिर से इस गांव पर सभी की नज़रें टिकी हुई हैं। दरअसल स्यूपुरी गांव में इस बार एक नहीं बल्कि कई दुलर्भ पौराणिक पांडुलिपियों का खजाना मिला है। बताया जा रहा है कि ये सभी पांडुलिपियां 1785 से 1832 के बीच की हैं। इन पांडुलिपियों में गढ़वाल के इतिहास के बारे में बहुत सारी जानकारियां मिल सकती हैं। बताया जा रहा है कि गांव के ही रहने वाले सत्येंद्र पाल बर्त्वाल और धीरेंद्र बर्त्वाल एक पुराने घर की साफ-सफार्इ कर रहे थे।

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साफ सफाई के दौरान उन्हें वहां से रिंगाल की तीन टोकरियां मिलीं। इन टोकरियों में काफी संख्या में दुर्लभ पांडुलिपियां पाई गई हैं। उनका कहना है कि उनके पुर्वज स्व. ठाकुर हीरा सिंह बर्त्वाल नौजुला के थोकदार और मालगुजार थे। ये पांडुलिपियां उसी वक्त की हैं। उनका कहना है कि इन पांडुलिपियों में गढ़वाल के इतिहास के बारे में कई जानकारियां मिल सकती हैं। बताया जा रहा है कि इन पांडुलिपियों पर साफ लिखाई नहीं हैं लेकिन खुशी की बात ये है कि ये सभी पांडुलिपि सुरक्षित हैं। उन्होंने बताया कि गढ़वाल के इतिहास के बारे में इन पांडुलिपियों से कई जानकारियां हासिल हो सकती हैं। रुद्रप्रयाग के डीएम मंगेश घिल्डियाल का कहना है कि इन दुर्लभ पांडुलिपियों का मिलना गौरव की बात है। इसलिए इन पांडुलिपियों के शोध और संरक्षण के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा।

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अब आपको इन पांडुलिपियों के बारे में खास बातें बता देते हैं। सत्येंद्र पाल सिंह बर्त्वाल और धीरेंद्र सिंह बर्त्वाल का कहना है कि उन्होंने चार दिन पहले अपने दादा स्व. ठाकुर हीरा सिंह बर्त्वाल का कक्ष खोला तो कमरे में करीब 200 से ज्यादा दुर्लभ पांडुलिपियां मिलीं। ये सभी पांडुलिपियां एक टोकरी में रखी गईं थीं। दो सेमी से लेकर 12 फीट लंबे कागज पर लिखी इन पांडुलिपियों से बहुत कुछ जानकारियां मिल सकती हैं। इन पांडुलिपियों में जो सबसे पुरानी पांडुलिपि बताई जा रही है, वो करीब 1785 की लिखी गई है। परिवार का कहना है कि घर में और भी ऐतिहासिक वस्तुएं हैं। हाल ही में स्यूंपरी गांव में ही ठाकुर महेंन्द्र सिंह बर्त्वाल के घर श्रीबदरीनाथ धाम की आरती की पांडुलिपि मिली थी। यूसैक द्वारा इस दुर्लभ धरोहर को प्रमाणित किया गया था। अब एक बार फिर से दुर्लभ पांडुलिपियों के मिलने साफ है कि उत्तराखंड में महान विद्वान पैदा हुए हैं।