उत्तराखंड की सुंदरधुंगा घाटी में वन विभाग के ट्रैप कैमरों में दुर्लभ सैटायर ट्रैगोपैन तीतर की मौजूदगी दर्ज की गई है। यह प्रजाति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘निकट संकटग्रस्त’ श्रेणी में है। इस खोज ने क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को एक बार फिर उजागर किया है
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राज्य समीक्षा डेस्क
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Image: Rare Satyr Tragopan Spotted in Sunderdhunga Valley
बागेश्वर: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले स्थित सुंदरधुंगा घाटी एक बार फिर चर्चा में है। यह घाटी पहले से ही हिम तेंदुआ, तिब्बती भेड़िया, बंगाल टाइगर और कस्तूरी मृग जैसे दुर्लभ जीवों के लिए जानी जाती है। अब इसमें एक और अनमोल नाम जुड़ गया है—सैटायर ट्रैगोपैन, जो बेहद दुर्लभ तीतर प्रजाति है।
Rare Satyr Tragopan Spotted in Sunderdhunga Valley
वन विभाग ने पिछले साल हिम तेंदुओं की निगरानी के लिए पिंडारी, सुंदरधुंगा और कफनी क्षेत्रों में 55 ट्रैप कैमरे लगाए थे। इसी अभियान के दौरान वैज्ञानिक रजत जोशी के नेतृत्व में टीम को न सिर्फ बंगाल टाइगर के प्रमाण मिले, बल्कि एक बेहद दुर्लभ पक्षी सैटायर ट्रैगोपैन भी कैमरे में कैद हुआ। यह खोज विशेषज्ञों के लिए उत्साहजनक है और क्षेत्र की पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती है। वन विभाग के अनुसार, इस मिशन के दौरान कई दुर्लभ जीवों और वनस्पतियों की मौजूदगी दर्ज हुई है। पिंडर, कफनी और सुंदरधुंगा के वन क्षेत्र इन प्रजातियों को सुरक्षित आवास प्रदान करते हैं। डीएफओ आदित्य रत्न के मुताबिक, भविष्य में इस क्षेत्र में और गहन शोध और खोजबीन की योजना बनाई जाएगी। आगे पढ़िए..
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क्या है सैटायर ट्रैगोपैन?
Image: Rare Satyr Tragopan
सैटायर ट्रैगोपैन एक खूबसूरत और शर्मीला तीतर है, जो मुख्य रूप से पूर्वी और मध्य हिमालय में 2400 से 4200 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। इस पक्षी की घने, नम और समशीतोष्ण वन में छिपकर रहने की आदत होती है, जिस कारण इसको देखना दुर्लभ होता है। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार, इसे देख पाना बेहद कठिन होता है, यही वजह है कि इसका कैमरे में कैद होना बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
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कोकलास तीतर भी कैमरे में कैद
Image: rare sighting of the elusive Koklass
अभियान में कोकलास तीतर की तस्वीर भी कैमरे में कैद हुई है। यह पक्षी चौड़ी पत्ती वाले मिश्रित वन में 1800 से 3300 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। कोकलास तीतर की संख्या में धीरे-धीरे कम होती जा रही है, हालांकि यह अभी संकटग्रस्त श्रेणी में नहीं है, लेकिन इसकी घटती संख्या चिंता का विषय है। अपनी शानदार कलगी, पंखों के बारीक पैटर्न और गर्दन पर मौजूद सफ़ेद धब्बे के लिए मशहूर, हिमालय का यह तीतर पहाड़ी जंगल की ज़मीन के साथ पूरी तरह से घुल-मिल जाता है। अक्सर दिखाई देने से पहले ही इसकी आवाज़ सुनाई दे जाती है; कोकलास तीतर पश्चिमी हिमालय के सबसे ज़्यादा छिपे रहने वाले पक्षियों में से एक है, जिसकी वजह से वन्यजीव फ़ोटोग्राफ़रों के लिए इस तरह के नज़ारे सचमुच बेहद खास बन जाते हैं।