Uttarakhand wildlife: उत्तराखंड में Corbett Tiger Reserve के पास चार साल बाद दुर्लभ वाइट-रम्प्ड वल्चर गिद्धों का झुंड देखा गया है। यह वन्यजीव संरक्षण के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
Advertisement
हजारों वर्षों से जलती अखंड ज्योति के सामने सात फेरे - आस्था, परंपरा और प्रकृति का अनोखा संगम
पहाड़, मंत्र और देवभूमि का आशीर्वाद.. त्रियुगीनारायण में शादी सिर्फ एक समारोह नहीं, आध्यात्मिक अनुभव है।
Example Ads Media
Image: Rare White Rumped Vulture spotted in Corbett after 4 years
रामनगर: उत्तराखंड में Corbett Tiger Reserve के पास स्थित टेड़ा गांव के जंगल में चार साल बाद वाइट रम्प्ड वल्चर गिद्धों का झुंड देखा गया है। सात गिद्धों का एक साथ दिखना वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए बेहद खास और सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
Rare White Rumped Vulture spotted in Corbett after 4 years
वाइट रम्प्ड वल्चर प्रजाति लंबे समय से विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही है। इसका मुख्य कारण डाइक्लोफेनाक नामक दवा है, जो पशु-चिकित्सा में इस्तेमाल होती है। इस दवा से प्रभावित मृत पशुओं को खाने के बाद बड़ी संख्या में गिद्धों की मौत हो जाती है, जिससे इनकी आबादी तेजी से घटी है। गिद्धों की घटती संख्या के पीछे केवल दवा ही नहीं, बल्कि कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं। सुरक्षित भोजन की कमी, बड़े पेड़ों की कटाई और बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप इन पक्षियों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं।
फोटोग्राफर ने कैद किया दुर्लभ नजारा
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर Deep Rajwar ने इस दुर्लभ पल को अपने कैमरे में कैद किया। उनके अनुसार, एक साथ इतने गिद्धों का दिखना सामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह संरक्षण के प्रयासों की सफलता का संकेत है। इससे पहले भी अलग-अलग समय पर गिद्धों की मौजूदगी के संकेत मिलते रहे हैं। वर्ष 2013 तक रामनगर के रिंगोरा गांव में इनकी अच्छी संख्या थी। इसके बाद 2017 में झिरना रेंज और 2021 में कोसी रेंज में कुछ गिद्ध देखे गए थे। अब चार साल बाद इनका झुंड एक साथ दिखना इनकी वापसी की ओर इशारा करता है।
-
संरक्षण के लिए उम्मीद की किरण
Image: Rare White Rumped Vulture
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना गिद्धों की संख्या में धीरे-धीरे सुधार का संकेत है। अगर संरक्षण के प्रयास इसी तरह जारी रहे, तो इस दुर्लभ प्रजाति को बचाया जा सकता है। गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है, क्योंकि वे मृत जीवों को खाकर पर्यावरण को साफ रखने में मदद करते हैं। उत्तराखंड में इनकी वापसी न केवल पर्यावरण के लिए अच्छी खबर है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सही प्रयासों से विलुप्त होती प्रजातियों को बचाया जा सकता है।